
उदयपुर। ओसवाल सभा के चुनाव से पहले ही समाज की राजनीति खुलकर सामने आ गई है। चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही आरोप-प्रत्यारोप, अविश्वास और शक्ति प्रदर्शन का माहौल बन गया है। नामांकन के पहले दिन हंगामे के बाद अब चुनाव की तारीख 7 दिन आगे बढ़ाकर 18 जनवरी 2026 कर दी गई है।
सोमवार को जैसे ही नामांकन प्रक्रिया शुरू होनी थी, ओसवाल भवन पर सन्नाटा पसरा मिला। अध्यक्ष पद के दावेदार संजय भंडारी अपनी टीम के साथ पहुंचे, लेकिन न तो कार्यालय खुला मिला और न ही कोई चुनाव अधिकारी मौजूद था। इसे लेकर विरोधी खेमे ने आरोप लगाया कि यह सब जानबूझकर किया गया ताकि विरोध को दबाया जा सके।
‘विरोधी घबरा गए’ बनाम ‘धांधली कर रहे हैं’

निवर्तमान अध्यक्ष प्रकाश कोठारी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विरोधी पहले ही हार की आशंका से घबरा गए हैं और माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि ओसवाल सभा के इतिहास में पहली बार समय पर चुनाव कराए जा रहे हैं।
वहीं, प्रत्याशी संजय भंडारी ने पलटवार करते हुए कहा कि अध्यक्ष खुद घबराए हुए हैं और इसी कारण चुनाव प्रक्रिया में धांधली की जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि नए मतदाताओं की सूची तक उपलब्ध नहीं कराई जा रही, जबकि बिना पारदर्शिता के निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है।

सत्ता और संगठन के बीच टकराव
ओसवाल सभा में करीब 9 हजार मतदाता हैं, ऐसे में यह चुनाव सिर्फ एक संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक शक्ति संतुलन की लड़ाई बन चुका है। एक ओर वर्तमान नेतृत्व अपने कार्यकाल को नियमों के अनुसार पूरा करने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर विरोधी गुट इसे सत्ता बनाए रखने की रणनीति बता रहा है।
नामांकन के दौरान वरिष्ठ सदस्य हिम्मत सिंह मेहता भी आवेदन जमा नहीं कर सके। उन्होंने मतदाता सूची उपलब्ध नहीं कराए जाने पर आपत्ति जताई, जिससे असंतोष और गहराता नजर आया।
शाम की बैठक में बड़ा फैसला
हिरणमगरी में हुई कार्यकारिणी बैठक में कई अहम निर्णय लिए गए। चुनाव 18 जनवरी को कराने, नई चुनाव समिति के गठन और मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया तय की गई। इसके साथ ही 31 दिसंबर की मारपीट की घटना की निंदा भी की गई।
अध्यक्ष कोठारी ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी स्थिति में कार्यकाल बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं, जबकि कुछ सदस्यों ने चुनाव एक साल टालने का प्रस्ताव रखा था।
समाज में बढ़ती राजनीतिक खाई
ओसवाल सभा का यह विवाद अब केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज के भीतर विश्वास और नेतृत्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। एक तरफ पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग है, तो दूसरी ओर सत्ता पर पकड़ बनाए रखने का आरोप।
अब देखना यह है कि 18 जनवरी को होने वाला चुनाव समाज को एकजुट करता है या यह खींचतान और गहरी होती है।
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