उदयपुर की बिसात : जिला प्रमुख की कुर्सी, सामान्य वर्ग की बाजी और पहले चरण का सियासी चक्रव्यूह

सैयद हबीब, उदयपुर

राजस्थान की राजनीति में जब भी मेवाड़ अंगड़ाई लेता है, उसकी गूंज केवल झीलों के किनारे तक सीमित नहीं रहती, बल्कि राजधानी के सत्ता-गलियारों को भी बेचैन कर देती है। 22 अक्टूबर को उदयपुर जिला परिषद के पहले चरण के लिए होने जा रहा मतदान केवल 25 वार्डों के भाग्य का फैसला नहीं है, यह दरअसल उस राजनीतिक शतरंज का पहला और सबसे निर्णायक मोहरा है, जिसके जरिए तय होगा कि जिला प्रमुख की चाबी किसके हाथ लगेगी। यहां यह बात बताना जरूरी है कि नगर निगम चुनाव से पहले मेयर के रूप में दिनेश भट्ट का नाम टॉप पर था और उन्हें डिप्टी मेयर पर ही संतोष करना पड़ा, ठीक उसी तरह जिला प्रमुख के रूप में हिम्म्त सिंह झाला का नाम सबसे ऊपर है।

इस बार की लड़ाई की सबसे बड़ी राजनीतिक बारीकी यह है कि उदयपुर जिला प्रमुख का पद ‘सामान्य वर्ग (ओपन)’ के लिए निर्धारित है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस—दोनों ही खेमों के भीतर की फुसफुसाहट और समीकरण यही इशारा कर रहे हैं कि दोनों दल किसी पुरुष चेहरे को ही इस शीर्ष पद पर बिठाने की जुगत में हैं।

पहले चरण की 25 सीटें : भाजपा की जीवन-रेखा, कांग्रेस का इंतजार

उदयपुर जिला परिषद के कुल 47 वार्डों में से पहले ही चरण में 25 वार्डों पर मतदान हो रहा है। इन 25 वार्डों का सामाजिक और राजनीतिक ताना-बाना बेहद दिलचस्प है:

7 सामान्य ओपन और 6 सामान्य महिला वार्ड

5 अनुसूचित जनजाति (ST) ओपन और 5 ST महिला वार्ड

1 अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) ओपन और 1 अनुसूचित जाति (SC) महिला वार्ड

सियासी विश्लेषक लालकुमार चुग की नजर से देखें, तो पूरे जिले में सामान्य वर्ग (ओपन) के कुल 8 वार्ड हैं, जिनमें से 7 वार्डों का चुनावी फैसला इसी पहले चरण में तय हो जाना है। यही वह बिंदु है जहां भाजपा और कांग्रेस की रणनीतियां एक-दूसरे से टकराती हैं।

भाजपा के लिए यह पहला चरण ‘करो या मरो’ जैसा है। अगर भाजपा को अपने दम पर जिला प्रमुख बनाना है, तो उसका प्रमुख चेहरा इन्हीं सामान्य वार्डों से निकलना तय माना जा रहा है। यानी पहले चरण की बाजी फिसली, तो भाजपा की पूरी इमारत ढह सकती है। इसके विपरीत, कांग्रेस का आधार और उसकी वास्तविक ताकत दूसरे चरण में आने वाले ग्रामीण व आदिवासी अंचलों के समीकरणों पर टिकी है। कांग्रेस के लिए पहला चरण नुकसान सीमित रखने की कवायद है, जबकि असली खेल उसके लिए दूसरे चरण से खुलेगा।

47 वार्डों की जमीनी हकीकत : सीधी टक्कर कम, त्रिकोणीय उलझन ज्यादा

कागजों पर भले ही यह चुनाव भाजपा और कांग्रेस की सीधी नूराकुश्ती दिखता हो, लेकिन 47 वार्डों के चुनावी फलक पर उभरे आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। कुल 47 वार्डों में:

सीधा मुकाबला (आमने-सामने): केवल 20 वार्डों में सिमटा है।

त्रिकोणीय मुकाबला: 22 वार्डों में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति है, जो किसी भी दल का समीकरण बिगाड़ सकती है।

चतुष्कोणीय मुकाबला : 5 वार्डों में चार-तरफा घमासान मचा हुआ है।

मैदान में उतरे कुल 126 प्रत्याशियों का जमावड़ा बताता है कि बागी और क्षेत्रीय ताकतें दोनों प्रमुख दलों की नींद उड़ाने के लिए तैयार हैं। जहां भाजपा और कांग्रेस ने सभी 47 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, वहीं भारत आदिवासी पार्टी (BAP) ने 20 सीटों पर ताल ठोककर पूरे आदिवासी बेल्ट के समीकरणों को हिला कर रख दिया है। इसके अलावा 4 निर्दलीय, माकपा (CPM) के 3 और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के 3 प्रत्याशी मैदान में खूंटा गाड़कर खड़े हैं।

पर्दे के पीछे का सच : चौपालों की चुप्पी और नेताओं की धड़कनें

नेताओं के दावों और मंचों के भाषणों से इतर, मेवाड़ के गांवों और चौपालों पर इस समय एक अजीब-सी खामोशी है। मतदाता मुस्कुरा रहा है, हाथ जोड़ रहा है, लेकिन अपने पत्ते नहीं खोल रहा। पहले चरण की यह 25 सीटें केवल एक प्रशासनिक चुनाव नहीं हैं, यह इस बात का इम्तिहान है कि सत्ताधारी पार्टी की पकड़ जमीन पर कितनी बची है और विपक्ष सत्ता-विरोधी लहर को वोटों में तब्दील करने का माद्दा रखता है या नहीं।

22 अक्टूबर की सुबह जब मतपेटियां या ईवीएम खुलेंगी, तो मतदान केवल वार्ड सदस्यों के लिए नहीं होगा। उस दिन तय होगा कि मेवाड़ की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है—और जिला प्रमुख के ख्वाब देख रहे किस दिग्गज की हसरतें पहले ही चरण में धुआं हो जाती हैं।

 

(Visited 16 times, 5 visits today)

About Author

Leave a Reply