उज्जैन। हमारे देश में सम्मेलनों और गोष्ठियों की कोई कमी नहीं है, लेकिन उनमें से अधिकतर केवल औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। असली विमर्श वह है जो समय की नब्ज को पहचाने और भविष्य की दिशा तय करे। महाकाल की पुण्य नगरी उज्जैन के प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शासकीय माधव महाविद्यालय में जब दो दिवसीय ‘द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति कॉन्फ्रेंस’ का पर्दा उठा, तो मुझे लगा कि हमारे अकादमिक जगत में अब भी वह चेतना जीवित है, जो सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं बांटती, बल्कि राष्ट्र के सामने खड़ी विकट चुनौतियों से दो-दो हाथ करने का साहस जुटाती है।
वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनाने का संकल्प हवा में नहीं तैर सकता। जब तक हमारी नदियां मैली रहेंगी, हवा में जहर घुला रहेगा और मिट्टी बंजर होती रहेगी, तब तक कोई भी राष्ट्र खुद को सच्चा विकसित नहीं कह सकता। इसी मर्म को छूते हुए इस संगोष्ठी का मूल विषय रखा गया—सतत संसाधन प्रबंधन और पारिस्थितिक संतुलन।
सूखते जंगल और बढ़ता कचरा: असल संकट की पहचान
कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में संयोजक डॉ. मोहन निमोले ने जब इस आयोजन की रूपरेखा रखी, तो उन्होंने साफ किया कि यह मंच सिर्फ अकादमिक चर्चाओं के लिए नहीं, बल्कि नीतिगत समाधान खोजने के लिए सजा है।
मुझे प्रकृति शोध संस्थान, उदयपुर के संस्थापक डॉ. पी. आर. व्यास की वह दो-टूक बात बहुत पसंद आई, जिसमें उन्होंने कहा कि सूखते जंगल, तपती धूप और सड़कों पर बढ़ते कचरे के ढेर का ठोस समाधान निकालना ही होगा। वे बिल्कुल सच कहते हैं। पर्यावरण पर जब तक धरातल पर काम नहीं होगा, तब तक कागजी प्रस्तावों से प्रकृति नहीं बचने वाली। मुख्य वक्ता प्रो. पृथ्वीश नाग ने भी बिल्कुल सही नब्ज पकड़ी कि यदि 2047 के विकसित भारत की इमारत खड़ी करनी है, तो उसकी नींव पारिस्थितिकी के संतुलन और वैज्ञानिक समझ पर ही टिकानी होगी।
विश्वविद्यालयी सोच और वैश्विक दायित्व
मुख्य अतिथि प्रो. आलोक श्रीवास्तव की उपस्थिति ने विमर्श को गंभीरता दी, वहीं महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. कल्पना वीरेंद्र सिंह ने इस बात पर बिल्कुल उचित बल दिया कि विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति संवेदनशील और वैश्विक दृष्टिकोण का निर्माण करना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। केवल उपाधियां बांटना शिक्षा नहीं है; शिक्षा का मूल उद्देश्य इंसान को प्रकृति के प्रति जवाबदेह बनाना है। प्रो. देवेंदर कौर बग्गा और प्रो. एम. एस. पंवार ने भी आधुनिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच सामंजस्य बैठाने के व्यावहारिक पहलुओं पर सटीक विचार रखे।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. राजश्री सेठ ने सहजता से किया, जबकि आयोजन सचिव डॉ. प्रमिला बघेल और सह-संयोजक डॉ. गणेश राठौर ने सभी शोधार्थियों व विद्वानों के प्रति आभार प्रकट किया। डॉ. रफीक नागोरी के अनुसार, इस दो दिवसीय समागम में देश-विदेश के शोधार्थी अपने शोध पत्रों के जरिए नई राहें सुझाएंगे।
प्रो. व्यास के नजरिये देखें तो प्रकृति पर संकट किसी एक राज्य या देश का नहीं, बल्कि समूची मानवता का संकट है। जब तक हमारी विकास की परिभाषा में पेड़, पहाड़, हवा और पानी का सम्मान शामिल नहीं होगा, तब तक विकास की हर छलांग अंधी दौड़ साबित होगी। उज्जैन के माधव महाविद्यालय से उठा यह प्रकृति का संदेश केवल शोधार्थियों के शोध पत्रों में बंद न रहे, बल्कि यह देश के नीति-निर्माताओं के कानों तक पहुंचे, तभी ऐसे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की वास्तविक सार्थकता सिद्ध होगी।
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