
एक तारा टूटने से आसमान सूना नहीं होता…
एक दिन पहले जब मेवाड़ की फिजाओं में धनराज जी ने ये शब्द गाए होंगे, तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वे अपनी ही विदाई की भूमिका लिख रहे हैं। नियति का क्रूर विधान देखिए कि जीवन की नश्वरता का उपदेश देने वाला वह स्वर, भोर की पहली किरण फूटने से पहले ही अनंत में विलीन हो गया।
शुक्रवार तड़के जब दुनिया नींद की आगोश में थी, तब उदयपुर-चित्तौड़गढ़ हाईवे पर आई ‘नींद की एक झपकी’ काल बनकर आई। सुरों के उस साधक की आवाज हमेशा के लिए मौन हो गई, जिसकी तान सुनकर हज़ारों लोग सुध-बुध खो बैठते थे। 56 वर्ष की आयु, जो अनुभव और साधना के शिखर की ओर बढ़ रही थी, एक मोड़ पर थम गई।
आखिरी शब्द, आखिरी पैगाम
अपनी अंतिम भजन संध्या में उन्होंने जो पंक्तियाँ गाईं, वे अब उनके चाहने वालों के दिलों में किसी तीर की तरह चुभ रही हैं। उन्होंने गाया था कि हमारे बिना भी ये काफिले चलते रहेंगे। आज काफिला तो चला, लेकिन वह उनकी अंतिम यात्रा का था। बड़वाई गाँव की गलियों में जब उनका पार्थिव देह पहुँचा, तो मानों पत्थर भी रो पड़े हों। संगीत जगत के दिग्गज कलाकारों से लेकर आम जनमानस तक, हर आँख नम थी और हर चेहरा उस ‘कोहिनूर’ के खो जाने के गम में डूबा था।
विलीन हुए सुर, शेष रही स्मृतियां
गणपत और सोनू ने जब मुखाग्नि दी, तो पंचतत्व में केवल एक शरीर विलीन नहीं हुआ, बल्कि निर्गुणी भजनों की एक पूरी परंपरा का एक अध्याय समाप्त हो गया। धनराज जोशी आज हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन जब-जब निर्गुण की बात होगी, जब-जब कबीर और मीरा के पदों को रूहानी आवाज़ की तलाश होगी, धनराज जी की स्मृतियाँ हमारे कानों में गूँजती रहेंगी।
नमन है उस आवाज़ को, जो अब ईश्वर के दरबार में गूँज रही होगी।
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