
उदयपुर। चुनावों में सर्वाधिक मतों से जीत का परचम लहराने के बाद उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन इन दिनों सत्ता की ‘खुमारी’ और विकास की ‘जंग’ एक साथ लड़ रहे हैं. बंपर जीत के बाद उनका आत्मविश्वास (या यूं कहें कि सीना) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 56 इंच के दावों से होड़ करता नजर आ रहा है, और वे खुद ही अपनी लोकप्रियता का ‘सर्टिफिकेट’ भी जारी करते रहते हैं. लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि उनके इसी ’56 इंची’ रुतबे और कथित अहंकार के आगे अब आम जनता और कार्यकर्ताओं की आवाजें दम तोड़ रही हैं.
इस समय विधायक की कार्यप्रणाली को लेकर शहर में तारीफों से ज्यादा आलोचनाओं के सुर मुखर होने लगे हैं.
कार्यालय पर सिर्फ मिल रही है मायूसी, ‘डिजायर’ लिखने से विधायक साहब का इनकार
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और हैरान करने वाला मुद्दा विधायक कार्यालय से सामने आ रहा है. आम तौर पर विधायक अपने क्षेत्र के कार्यकर्ताओं और जनता की सिफारिशों (डिजायर) के आधार पर काम करते हैं, लेकिन ताराचंद जैन ने इस परंपरा से पूरी तरह तौबा कर ली है.
इन दिनों उनके कार्यालय पर अपनी जायज मांगों को लेकर ‘डिजायर’ लिखवाने के लिए कार्यकर्ताओं और आमजन को मायूस ही लौटना पड़ रहा है, लेकिन विधायक साहब किसी की भी डिजायर लिखने को तैयार नहीं हैं. मंत्रियों और अधिकारियों तक जनता की बात पहुंचाने वाले इस सबसे अहम दस्तावेज पर विधायक के इनकार ने जमीनी कार्यकर्ताओं को गहरे असमंजस और निराशा में डाल दिया है.
सुनते सबकी हैं, पर करते सिर्फ अपने मन की: ‘पहले आप’ फिर ‘खुद की भी नहीं’
विधायक साहब की कार्यशैली पर कटाक्ष करते हुए अब लोग कहने लगे हैं कि वे ‘वन-वे ट्रैफिक’ की तरह काम करते हैं. आमजन या अपने ही कार्यकर्ताओं की बात सुनने के लिए उनके पास फुर्सत के चंद पल ही होते हैं, और वह भी इतनी जल्दबाजी में कि अगर बात पहली बार में समझ आ गई तो ठीक, वरना दोबारा वे उस पर ध्यान देने की जहमत तक नहीं उठाते.
राजनीतिक गलियारों में चर्चा आम है कि विधायक साहब जो एक बार सोच लेते हैं, बस वही करते हैं. इसके बाद तो वे ‘Self-Mode’ में चले जाते हैं, जहां वे खुद की भी सुनना बंद कर देते हैं. पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया के मार्गदर्शन का दावा करने वाले विधायक शायद यह भूल रहे हैं कि लोकतंत्र में जनता की बात को अनसुना करना कितना भारी पड़ सकता है.
20 साल पुराने मुद्दों पर ‘एड़ी-चोटी का जोर’, प्रासंगिकता पर सवाल
यह सही है कि विधायक का पूरा ध्यान इन दिनों आयड़, एलिवेटेड रोड और मुखर्जी चौक जैसी परियोजनाओं पर केंद्रित है, और वे इसे अपने ही कार्यकाल में पूरा कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं. लेकिन यहां भी एक गहरा कटाक्ष छिपा है—जिन मुद्दों को लेकर वे इतने गंभीर हैं, वे दरअसल 20 साल पुराने हैं. आज के बदलते दौर में इन पुराने प्रोजेक्ट्स की उपयोगिता और प्रासंगिकता कितनी बची है, यह तो तकनीकी अधिकारी ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन विधायक साहब पुरानी लीक को ही विकास का नाम देने पर अड़े हुए हैं. इसके साथ ही, शिक्षकों के तबादलों (ट्रांसफर) को लेकर उनकी जरूरत से ज्यादा चिंता भी चर्चा का विषय बनी हुई है.
अतिक्रमण पर कार्रवाई : वाहवाही के साथ बढ़ रही है नाराजगी, संगठन पर पकड़ हुई कमजोर
शहर में अतिक्रमण के खिलाफ हो रही ताबड़तोड़ कार्रवाई का सेहरा भी विधायक साहब के ही सिर बांध रहे बंध रहा है. हालांकि, इस कार्रवाई ने शहर को दो धड़ों में बांट दिया है—एक पक्ष जहां खुश है, वहीं उजाड़ा गया दूसरा पक्ष बुरी तरह नाराज है. अधिकारियों के साथ उनकी ‘बेहतर लाइजिंग’ (साठगांठ) तो जगजाहिर है, जिसके दम पर वे मनमर्जी के फैसले करवा रहे हैं, लेकिन इसकी कीमत पार्टी संगठन को चुकानी पड़ रही है.
तमाम कोशिशों और प्रशासनिक रसूख के बावजूद विधायक साहब संगठन के भीतर अपने विरोधियों का बाल भी बांका नहीं कर पाए हैं, जिससे साफ है कि संगठन पर उनकी पकड़ दिन-प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है.
जनता को अब भी उम्मीद : विधायक साहब के इस बदले हुए रूप, काम के तरीके और उपजे कथित ‘अहंकार’ को लेकर जनता चुपचाप सब देख रही है. शहर के प्रबुद्ध लोगों और मतदाताओं को अब भी उम्मीद है कि आने वाले समय में जब दोबारा जनता के बीच वोट मांगने की नौबत आएगी, तब एमएलए साहब का यह 56 इंची अहंकार जरूर टूटेगा और वे एक बार फिर आम नागरिकों के बीच उसी पुराने अंदाज में नजर आएंगे.
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