
नई दिल्ली। जिंदगी में जब कोई सपना टूटता है, तो दिल का एक कोना भी साथ में चटक जाता है. लेकिन क्या टूटने का मतलब हमेशा खत्म हो जाना होता है? वेदांता समूह के संस्थापक और चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने जिंदगी, संघर्ष और असफलताओं को लेकर एक ऐसी मार्मिक और दिल को छू लेने वाली सोच साझा की है, जो हार मान चुके किसी भी शख्स में नई उम्मीद जगा दे. इसके लिए उन्होंने जापान की सदियों पुरानी एक बेहद खूबसूरत और भावुक परंपरा ‘किंत्सुगी’ (Kintsugi) का सहारा लिया है.
किंत्सुगी जापान की वह कला है, जहाँ मिट्टी का कोई खूबसूरत बर्तन जब टूटकर बिखर जाता है, तो उसे फेंकने या उसकी दरारों को छुपाने के बजाय, सोने की पिघली हुई लकीरों से वापस जोड़ा जाता है.
अनिल अग्रवाल ने हाल ही में अपनी जापान यात्रा के दौरान जब इस कला को करीब से देखा, तो उनका दिल भर आया. उन्हें लगा कि यह सिर्फ मिट्टी के बर्तनों को जोड़ने की कला नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगी और उसके संघर्षों की ही दास्तान है.
“अगर वो नाकामियां न होतीं, तो आज मैं यह न होता…”
अपनी भावुक पोस्ट में उन्होंने अपने जीवन के उस पन्ने को पलटा है, जिसे अक्सर लोग छुपाना चाहते हैं. उन्होंने बेहद ईमानदारी और गहराई से अपने दिल की बात साझा करते हुए लिखा:
“Kintsugi, अपनी खामियों और failures को भी अपनाने की खूबसूरत philosophy! मेरे जीवन में जहाँ कई businesses सफल हुए, वहाँ कई ऐसे भी रहे, जो सफल नहीं हो पाए. उस समय लगा कि शायद कुछ छूट गया, कुछ टूट गया. मगर आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है, अगर वो failures न होते, तो शायद मैं भी आज जो बन पाया, शायद कभी ना बन पाता.”
उन्होंने आगे लिखा कि हमारी दरारें, हमारे जीवन के वो जख्म या नाकामियां हमारी कमजोरी नहीं हैं. कोई भी असफलता हमारी जिंदगी का आखिरी पन्ना नहीं होती. असल में यही दरारें हमें वक्त के साथ और ज्यादा मजबूत और पहले से कहीं ज्यादा खूबसूरत इंसान बनाती हैं.
चुनौतियों से जूझते युवाओं के नाम एक पैगाम
चार दशकों के लंबे सफर के बाद, कामयाबी के शिखर पर बैठे अनिल अग्रवाल का यह संदेश आज के उन युवाओं, उद्यमियों और प्रोफेशनल्स के लिए मरहम जैसा है जो एक असफलता से टूटकर बैठ जाते हैं. उनका मानना है कि जब कोई रास्ता बंद होता है, तो वह स्थायी हार नहीं है, बल्कि वह वक्त होता है खुद को समेटने का, कुछ नया सीखने का और आगे बढ़ने का. जिंदगी के हर पड़ाव को, उसकी हर खरोंच के साथ गले लगाना ही असल जीना है. यही चुनौतियाँ हमें अंदर से और समझदार, संवेदनशील और मजबूत बनाती हैं.
कामयाबी से बढ़कर है समाज का दर्द
एक बेहद साधारण पृष्ठभूमि से उठकर वेदांता जैसे वैश्विक और विशाल समूह की नींव रखने वाले अनिल अग्रवाल आज सिर्फ एक कारोबारी नहीं, बल्कि लाखों चेहरों पर मुस्कान लाने वाले शख्स भी हैं. उनका मानना है कि जो कुछ इस जिंदगी और समाज से मिला है, उसे उसी आदर के साथ वापस लौटा देना चाहिए.
इसी भावुक सोच के साथ उन्होंने ‘द गिविंग प्लेज’ के जरिए अपनी $75\%$ संपत्ति समाज के कल्याण के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया है. आज उनका ‘अनिल अग्रवाल फाउंडेशन’ और उसकी अनोखी पहल ‘नंद घर’ देश भर के $15,000$ से अधिक केंद्रों के जरिए मासूम बच्चों को पौष्टिक आहार, शुरुआती शिक्षा और मां जैसी ममतामई स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे हैं, ताकि देश की महिलाओं और बच्चों का भविष्य भी सोने की तरह चमक सके.
About Author
You may also like
बड़े अस्पताल में इमरजेंसी के बेजान दरवाजे और इंसानियत की धड़कन : परदे के पीछे का दर्द
झीलों के शहर में प्यास की नौटंकी और सड़े हुए पाइप
जयपुर में राडो की ढाई करोड़ की सनसनीखेज डकैती!
उदयपुर रिश्वतकांड में एएसपी की जासूसी और आईफोन के राज
34 हज़ार फीट पर भारतीय संस्कार और शौर्य : जब कैप्टन स्मित के अदम्य साहस के आगे नतमस्तक हुई दुनिया
