नवरात्रि में मां की कृपा पाने के लिए करें साधना: वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी में श्रीमद् देवी भागवत कथा का आयोजन, गूंजी देवी महिमा

उदयपुर: शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर नारायण सेवा संस्थान के तत्वावधान में नवनिर्मित ‘वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी’ परिसर में श्रीमद् देवी भागवत कथा एवं ‘अपनों से अपनी बात’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया जा रहा है। संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के सानिध्य में आयोजित इस कथा में देवी भगवती की महिमा, उनके अलौकिक शक्ति स्वरूप और भक्तों पर उनकी कृपा से जुड़े विभिन्न पौराणिक प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया गया।

राजकुमार सुदर्शन पर देवी कृपा और बीज मंत्र का प्रभाव कथा के दौरान अयोध्या के राजकुमार सुदर्शन का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया गया कि राजा ध्रुवसंधि के देहावसान के बाद उत्पन्न राजसत्ता के संकट के बीच माता मनोरमा सुदर्शन को लेकर महर्षि भरद्वाज के आश्रम पहुंची थीं। वहां बालक सुदर्शन द्वारा अनजाने में ही देवी के बीज मंत्र का निरंतर उच्चारण किया गया। इस निष्कपट साधना से प्रसन्न होकर मां भगवती ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और दिव्य धनुष-बाण प्रदान किए। आगे चलकर भगवती की असीम अनुकंपा से ही सुदर्शन का विवाह काशी की राजकुमारी शशिकला से हुआ और उन्होंने अयोध्या का निष्कंटक राज्य प्राप्त किया।

शुकदेव-जनक संवाद और हयग्रीव अवतार की कथा कथा प्रसंग में महर्षि वेदव्यास और उनके पुत्र शुकदेव के आख्यान का वर्णन करते हुए स्पष्ट किया गया कि मुक्ति संसार त्यागने में नहीं, बल्कि अनासक्त भाव से कर्तव्य निभाने में निहित है। मिथिला नरेश राजा जनक के इस बोध के बाद ही शुकदेव ने अपने पिता से देवी भागवत का गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया।

इसके साथ ही भगवान विष्णु के ‘हयग्रीव स्वरूप’ और देवी की महामाया शक्ति का रहस्य उद्घाटित किया गया कि किस प्रकार देवताओं के संकट निवारण हेतु भगवान विष्णु ने अश्वमुखी अवतार धारण कर असुर का संहार किया।

मां शाकंभरी और शताक्षी का प्राकट्य व्यासपीठ से दुर्गमासुर वध का प्रसंग सुनाते हुए बताया गया कि जब असुर ने वेदों का हरण कर लिया और पृथ्वी पर घोर अकाल पड़ा, तब ऋषियों के आर्तनाद पर मां भगवती प्रकट हुईं। उनके सौ नेत्रों से बही करुणा की अश्रुधारा से सूखे जलाशय भर गए। देवी ने वनस्पतियों, कंद-मूल और शाक से समस्त सृष्टि का पोषण किया, जिससे वे ‘शाकंभरी’ और ‘शताक्षी’ कहलाईं। तत्पश्चात मां ने दुर्गमासुर का वध कर वेदों की पुनर्स्थापना की।

कथा के दौरान सभागार देशभर से आए दिव्यांगजन, उनके परिजनों और श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा, जिन्होंने भक्तिभाव से ओतप्रोत होकर मां भगवती के दिव्य चरित्र का श्रवण किया।

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