उदयपुर में रामलीला का मंचन (तीसरा दिन) : जब पत्थर में जान फूंक दी गई और निम्बार्क मैदान में छलक उठीं आंखें

फोटो जर्नलिस्ट : कमल कुमावत

 

आप पढ़ रहे हैं हबीब की रिपोर्ट

अगर आप मुझसे पूछें कि इस मुल्क की सबसे बड़ी खूबी क्या है, तो मैं सियासी तकरीरें नहीं गिनाऊंगा। मैं कहूंगा—इस देश की अवाम का किस्सों पर यकीन करने का वो अनोखा शगल, जो सदियों से बदस्तूर जारी है। चाहे आप नास्तिक हों, संशयवादी हों या मेरी तरह शाम को एक पैग स्कॉच के साथ जिंदगी के फलसफे सुलझाने वाले इंसान—जब आप किसी खचाखच भरे पंडाल में हजारों लोगों को एक प्राचीन कथा के जादू में डूबते देखते हैं, तो आप उस भावुकता की ताकत को खारिज नहीं कर सकते।

रविवार की शाम उदयपुर के निम्बार्क महाविद्यालय मैदान में ठीक यही हुआ। मौका था दस दिवसीय रामलीला के तीसरे दिन का। वृंदावन से आए ‘पुष्टिमार्गीय श्री कृष्ण लीला संस्थान’ के मंजे हुए कलाकारों ने जब अपना खेल शुरू किया, तो वह केवल अभिनय नहीं रहा; वह सीधे लोगों के दिल के उस कोने में उतर गया जिसे हम आस्था कहते हैं।

शाम की शुरुआत हनुमान चालीसा के पाठ के साथ हुई, जिसके बाद मंच पर महर्षि विश्वामित्र की जोरदार दस्तक हुई। राजा दशरथ के दरबार में पहुंचकर जब उन्होंने अपने यज्ञ की हिफाजत के लिए अयोध्या के नौजवान राजकुमारों—राम और लक्ष्मण—को मांगा, तो उस कशमकश और पितृ-मोह को कलाकारों ने बखूबी उभारा। इसके फौरन बाद ताड़का का वध और सुबाहु के संहार वाले एक्शन दृश्य आए, जिसे देखकर आगे बैठे बच्चों ने खूब सीटियां बजाईं और तालियां पीटीं।

लेकिन शाम का असली ‘क्लाइमेक्स’ वह नहीं था। असली ड्रामा तो उस वक्त पैदा हुआ जब विश्वामित्र श्रीराम को उस सुनसान आश्रम ले गए, जहां सदियों से गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या अपने पति के श्राप की वजह से बेजान पत्थर बनी पड़ी थीं।

तुलसीदास की वो अमर चौपाई पंडाल में गूंजी :

“गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥”

ऋषि विश्वामित्र ने आग्रह किया कि यह पाषाण देह सदियों से सिर्फ आपके चरण कमलों की धूल का इंतजार कर रही है, अब इस पर दया कीजिए। मंच पर जब अभिनेता ने राम के स्वरूप में उस निर्जीव पत्थर को अपने पैर से छुआ, और अहिल्या शापमुक्त होकर एक जीती-जागती, रोती हुई औरत के रूप में उठ खड़ी हुई—तो सामने बैठे दर्शकों में जो सन्नाटा खिंचा, वह देखने लायक था। अगले ही पल कई बुजुर्गों की दाढ़ी पर आंसू फिसल रहे थे, महिलाओं ने अपने आंचल आंखों पर रख लिए थे और पूरा मैदान ‘जय श्री राम’ के गगनभेदी नारों से दहल उठा। उस पल में कोई तर्क काम नहीं कर रहा था; वहां सिर्फ पश्चाताप और मुक्ति की वो आदिम मानवीय भावना थी, जो दुनिया के हर बड़े अदब की जान होती है।

रामलीला सिर्फ आस्था का नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के उस सामाजिक ताने-बाने का भी आईना है जहां धर्म, समाज और रसूख एक मंच पर इकट्ठे होते हैं। समिति के अध्यक्ष धर्मनारायण जोशी ने मंच पर शहर के एक से बढ़कर एक दिग्गजों को सम्मानित किया—अस्थल आश्रम के महंत रासबिहारी शरण, पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक डॉ. अश्विन दल्वी, विप्र फाउंडेशन के के.के. शर्मा, लक्ष्मीकांत वैष्णव, एडवोकेट रतन सिंह राव, पूर्व उप महापौर महेंद्र सिंह शेखावत, लक्ष्मण पुरी गोस्वामी, ओसवाल समाज के प्रकाश कोठारी, खटीक समाज के शैलेंद्र चौहान, गुजराती समाज के राजेश मोहता, सुधीर पोद्दार, कुसुम शर्मा, हीरालाल सोनी, शिवरतन तिवारी और प्रकाश दशोरा।

वहीं हरीश मारवाड़ा, डॉ. विजय प्रकाश विप्लवी, अशोक बाबेल, निर्मल चौबीसा, सत्येन्द्र चतुर, प्रभाष सुखवाल, अंजना जोशी और दिनेश गुप्ता जैसे आयोजक पूरी मुस्तैदी से इस बात का ख्याल रख रहे थे कि किसी खासमखास का स्वागत छूट न जाए।

महासचिव भंवर लाल शर्मा ने आने वाले दिनों का नक्शा भी खींच दिया है। सोमवार को पुष्प वाटिका और धनुष यज्ञ का वो क्लासिक ड्रामा होगा, और मंगलवार को राम-जानकी विवाह से पहले शाम 6 बजे अस्थल मंदिर से बाकायदा बिंदोली यानी बारात का जुलूस निकलेगा।

अगर आप मुझसे पूछें, तो इस भागदौड़ और तनाव से भरी दुनिया में अगर कोई किस्सा दो घंटे के लिए ही सही, इंसानों को उनकी नफरतों से निकालकर एक पत्थर के जी उठने पर रुला सकता है—तो उस रामलीला का मंचन हर हाल में देखा जाना चाहिए।

 

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