मेवाड़ की माटी में सत्ता की चौसर: जब पंचायत के अखाड़े में दांव पर लग जाए दिग्गजों की चौधराहट

उदयपुर। हमारे देश में लोकतंत्र की सबसे असली, बेबाक और नंगी तस्वीर संसद के वातानुकूलित गलियारों में नहीं, गांव की चौपालों और धूल भरी पगडंडियों पर दिखाई देती है। उदयपुर की पहाड़ियों और झीलों के बीच इन दिनों सत्ता की जो बिसात बिछी है, वह महज जिला परिषद के 47 वार्डों का साधारण चुनाव नहीं है। यह वर्चस्व, विरासत और भविष्य के सियासी वजूद की सीधी जंग है। नामांकन वापसी की मियाद खत्म होने के बाद जो तस्वीर छनकर सामने आई है, वह बताती है कि चुनावी अखाड़े में उतरे 126 चेहरों में से कितनों की रात की नींद और दिन का चैन दांव पर लगा हुआ है।

दलों के दफ्तरों से जारी पर्चियों ने गांवों के भाईचारे और रसूख को अजीब चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। कहने को भाजपा और कांग्रेस ने सभी 47 सीटों पर अपने मोहरे चले हैं, मगर इस बार खेल सिर्फ इन दो पारंपारिक सूरमाओं के बीच सिमटा हुआ नहीं है। दक्षिण राजस्थान की नब्ज पर हाथ रखने वाले जानते हैं कि भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के 20 प्रत्याशियों का मैदान में डटना कोई सामान्य परिघटना नहीं है। बीएपी ने सिर्फ सुरक्षित सीटों पर ही नहीं, बल्कि अनारक्षित सीटों पर भी ताल ठोककर दोनों स्थापित दलों के माथे पर गहरी लकीरें खींच दी हैं। इसके साथ ही निर्दलीयों की जिद, माकपा की मौजूदगी और रालोपा की दखलंदाजी ने 26 वार्डों में मुकाबले को ऐसा पेचीदा बना दिया है कि राजनीति के पुराने पंडित भी हार-जीत की गणित बिठाने में पसीने-पसीने हो रहे हैं।

यह चुनाव कई सियासी परिवारों के लिए ‘करो या मरो’ का इम्तिहान बन गया है। वार्ड 43 को ही देख लीजिए—वहां एक पिता की पूरी राजनीतिक पूंजी अपने बेटे को स्थापित करने की छटपटाहट में झोंकी जा रही है। मौजूदा कांग्रेस विधायक पुष्कर डांगी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपने बेटे शांतिलाल डांगी को पूर्व विधायक दलीचंद डांगी के कड़े अनुभव के सामने कैसे पार लगाते हैं। यह मुकाबला केवल एक सीट का नहीं, बल्कि एक नई सियासी पीढ़ी के भविष्य का फैसला करेगा।

उधर वार्ड 37 में वल्लभनगर के पूर्व भाजपा प्रत्याशी हिम्मत सिंह झाला के सामने कानून की बारीकियों को समझने वाले कांग्रेस के वकील प्रत्याशी देवीलाल जाट खड़े हैं। वार्ड 2 में कांग्रेस के पुराने क्षत्रप लालसिंह झाला को भाजपा के भोपाल सिंह देवड़ा चुनौती दे रहे हैं, तो वार्ड 32 में राजपूत करणी सेना के अर्जुनसिंह चुंडावत और कांग्रेस के राजसिंह झाला के बीच की तनातनी ने माहौल को गरमा दिया है। वार्ड 40 में भाजपा के पूर्व देहात अध्यक्ष डॉ. चंद्रगुप्तसिंह चौहान के सामने पुराने तपे-तपाए गणेशलाल जाट ताल ठोक रहे हैं।

इस चुनावी महाभारत का सबसे त्रासद और दिलचस्प पहलू वह है जहां राजनीति ने एक ही गांव के आंगनों को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है। कोटड़ा के देवला से लेकर सेलाना, मादला और बाठरड़ा कलां तक—सात ऐसे वार्ड हैं जहां एक ही गांव, एक ही बिरादरी और शायद एक ही कुनबे के लोग एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। जहां कल तक सुख-दुख का साझा था, वहां आज वोटों की दीवार खड़ी है।

तीन चरणों में—22 अक्टूबर, 28 अक्टूबर और 3 नवंबर को—मतपेटियों में बंद होने वाला यह जनादेश तय करेगा कि मेवाड़ के ग्रामीण अंचल में रसूखदारों की चौधराहट बरकरार रहती है या फिर हाशिए से उठी नई आवाजें सत्ता के इस पुराने किले को ढहा देती हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार चौपालों की चुप्पी में बगावत और बदलाव की गहरी गूंज साफ सुनाई दे रही है।

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