दिल के विशेषज्ञ डॉ. एसके कौशिक : धड़कनों की सरगम, विज्ञान की रोशनी और उदयपुर का गौरव

डॉ. जेके छापरवाल के सहयोग से

उदयपुर। इंसानी जिस्म में दिल सिर्फ मांस और लहू का एक छोटा-सा टुकड़ा नहीं है; यह उम्मीदों, जज्बातों और उस धड़कन का घर है, जिसके थमते ही जिंदगी का सारा नाटक एक पल में खत्म हो जाता है। सिनेमा के रूपहले परदे पर हमने कितनी ही बार देखा है कि जब कोई किरदार अपने सीने पर हाथ रखकर बैठ जाता है, तो पूरा थिएटर सांस रोक लेता है। उस नाजुक मोड़ पर जो मसीहा उस डूबती हुई सांस को दोबारा जिंदगी की डोर से बांधता है, दरअसल वही उस कहानी का असली नायक होता है।

अरावली की वादियों और झीलों के शहर उदयपुर के लिए यह गर्व और दिली सुकून का लम्हा है कि धड़कनों के इसी रहस्य और विज्ञान को साधने वाले शहर के मशहूर हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.के. कौशिक ने अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। दिल्ली-गुरुग्राम में 8 से 11 अक्टूबर तक सजी ‘इंडियन एकेडमी ऑफ इकोकार्डियोग्राफी’ (IAE) की 30वीं वार्षिक कॉन्फ्रेंस—’Echo Asia / Echo India 2026′ में डॉ. कौशिक को प्रतिष्ठित ‘नटेसा जी. पांडियन मेमोरियल ऑरेशन’ (स्मृति व्याख्यान) देने के लिए सम्मानित किया गया।

यह कोई साधारण जलसा या रस्मी खिताब नहीं था। प्रो. नटेसा पांडियन आधुनिक इकोकार्डियोग्राफी की दुनिया में उस प्रकाश-स्तंभ की तरह रहे हैं, जिन्होंने अल्ट्रासाउंड तरंगों के जरिए दिल की बंद कोठरियों और उसके बहते रक्त के नक्शे को इंसान की आंखों के सामने खोलकर रख दिया। उनकी पावन स्मृति में दिए जाने वाले व्याख्यान के मंच पर कदम रखना किसी भी चिकित्सक के लिए जीवन-साधना की सबसे ऊंची सीढ़ी चढ़ने जैसा होता है।

इकोकार्डियोग्राफी दरअसल धड़कते हुए दिल का वह मूक सिनेमा है, जहां बिना चीर-फाड़ के यह देखा जा सकता है कि कौन-सा वाल्व थक गया है, कौन-सी धमनी में रुकावट है और किस मासूम का दिल जन्म से ही अधूरा संघर्ष कर रहा है। एमडी और डीएम (कार्डियोलॉजी) की गहरी विद्वता से लैस डॉ. कौशिक बरसों से इसी विधा के जरिए जन्मजात हृदय रोगों, कोरोनरी आर्टरी डिजीज, हार्ट फेलियर और वाल्व की जटिल व्याधियों से जूझते अनगिनत इंसानों को नई जिंदगी का तोहफा देते आए हैं।

सम्मेलन के उस गरिमामयी मंच पर जब देश-विदेश के चोटी के विशेषज्ञ—डॉ. शांतनु सेनगुप्ता, डॉ. हंसा गुप्ता और डॉ. सिम्मी मनोचा—की मौजूदगी में डॉ. कौशिक को यह सम्मान सौंपा गया, तो वह केवल एक डॉक्टर का सम्मान नहीं था। वह उदयपुर की उस माटी और उन हजारों दुआओं का एहतराम था, जो किसी मरीज के स्वस्थ होकर घर लौटने पर खामोशी से आसमान की ओर उठती हैं।

जैसे किसी मुकम्मल फिल्म के अंत में जब नायक मुश्किलों को पार कर इंसानियत की जीत दर्ज करता है तो आंखों के कोने अनायास भीग जाते हैं, वैसे ही जब कोई फनकार अपनी मेहनत और मर्मज्ञता से मुल्क और दुनिया के नक्शे पर अपने शहर का नाम रौशन करता है, तो दिल से सिर्फ एक ही सदा निकलती है—साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती। डॉ. कौशिक की यह उपलब्धि बताती है कि जब हुनर के साथ करुणा जुड़ जाए, तो चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं, इबादत बन जाती है।

 

About Author

Leave a Reply