तकनीक जब इंसान की सहूलियत बने: हिंदुस्तान जिंक और उबर का यह साझा कदम भारतीय कॉर्पोरेट जगत के लिए एक नजीर

आप पढ़ रहे हैं हबीब की रिपोर्ट

उदयपुर। भारत की औद्योगिक यात्रा अब सिर्फ कारखानों की चिमनियों से उठते धुएं या मशीनों की गड़गड़ाहट तक सीमित नहीं रह गई है। असली आधुनिकता और सच्चा विकास वह है, जो काम करने वाले आम इंसान—हमारे कर्मचारियों—के जीवन को सरल, सहज और गरिमापूर्ण बनाए। जब तक व्यवस्था का केंद्रबिंदु मनुष्य नहीं होगा, तब तक कोई भी तकनीक सार्थक नहीं कही जा सकती।

उदयपुर से आई यह खबर कि दुनिया की सबसे बड़ी एकीकृत जिंक उत्पादक कंपनी ‘हिंदुस्तान जिंक’ ने अपने कर्मियों की यात्रा को सुगम और पारदर्शी बनाने के लिए ‘उबर फॉर बिजनेस’ के साथ हाथ मिलाया है, इसी मानवीय दृष्टिकोण का एक सुंदर प्रमाण है।

अक्सर हमारे देश के दफ्तरों में क्या होता है? एक साधारण कर्मचारी जब किसी दफ्तरी काम से, किसी मीटिंग या साइट विजिट के लिए निकलता है, तो यात्रा के बाद कागजी बिलों, वाउचर्स और फाइलों के मकड़जाल में उलझकर रह जाता है। इस नई व्यवस्था ने उस पूरी दकियानूसी कागजी कवायद पर ताला लगा दिया है। अब देश के 120 से अधिक शहरों में यात्रा करते समय हिंदुस्तान जिंक का कर्मी अपने मोबाइल फोन से एक क्लिक पर आधिकारिक गाड़ी बुक कर सकेगा और उसका भुगतान सीधे कॉरपोरेट स्तर पर तय हो जाएगा। यानी न जेब से पैसे खर्च करने का झंझट, न बिल संभालने की माथापच्ची।

कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमरेंदु प्रकाश का यह सोचना बिल्कुल दुरुस्त है कि तकनीक का इस्तेमाल केवल खदानों में मेटल निकालने, ऑटोमेशन या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका सीधा फायदा कर्मचारियों के रोजमर्रा के जीवन को छूना चाहिए। इसी तरह उबर के सुदीप्त अग्रवाल का यह प्रयास भी सराहनीय है कि वे व्यावसायिक यात्राओं को सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

एक सकारात्मक दृष्टि

मेरी दृष्टि में यह केवल दो बड़ी कंपनियों का व्यावसायिक समझौता नहीं है, बल्कि यह एक सुसंस्कृत कार्य-संस्कृति की बानगी है। हमारी प्राचीन भारतीय परंपरा में भी ‘श्रम’ और ‘श्रमिक’ के सम्मान को सर्वोपरि माना गया है। जब कोई औद्योगिक प्रतिष्ठान अपने माइनिंग और उत्पादन के साथ-साथ अपने लोगों के समय, उनकी सुरक्षा और उनकी सुविधा को इतनी गंभीरता से लेता है, तो वह पूरे भारतीय उद्योग जगत को यह संदेश देता है कि असली संपत्ति पूंजी नहीं, बल्कि उसमें काम करने वाले लोग हैं।

यदि भारत के अन्य सार्वजनिक और निजी संस्थान भी इसी तरह कर्मचारियों के कल्याण और पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था को अपनी कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाएं, तो हमारा देश न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि कार्य-संस्कृति के स्तर पर भी दुनिया का सिरमौर बन सकता है। यह एक अत्यंत प्रशंसनीय और अनुकरणीय पहल है।

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