विजयदशमी विशेष: ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ का शाश्वत संदेश और आधुनिक समाज में रावण-दहन की सार्थकता

-विष्णु शर्मा हितैषी
सत्य की जीत और असत्य की पराजय का महापर्व दशहरा अर्थात विजय दशमी एक वार्षिक कर्मकांड अथवा उत्सव ही नहीं है, यह आत्म समीक्षा का श्रेष्ठ अवसर भी है। वेदों ने बहुत पहले ही यह बता किया था, ‘सत्यं वद:, धर्मं चर:’ अर्थात सत्य बोलें, धर्म का अनुसरण करें। इसका सीधा संदेश है कि धर्म के अनुकूल आचरण से पहले हम सच बोलना सीखें। जब सच बोलेंगे, तभी धर्म की राह पर चल पाऐंगे। आज भी कानून-व्यवस्था का आधार सत्य ही है। यदि सत्य के मार्ग पर न चला जाए, तो अन्याय सुनिश्चित है और दशहरा हमें अन्याय के विरूद्ध संघर्ष की ही प्रेरणा देता है। दशहरा ‘दश’ और ‘अहन’, संस्कृत के दो शब्दों का योग है, जिसका अर्थ है- दस दिन। धर्म शास्त्रीय नियमों से विजयदशमी अपराजिता पूजन, शमीपूजन, सीमोल्लंघन, गृह-पुनरागमन, नए वस्त्र व आभूषण खरीदनें या धारण करने के साथ ही क्षत्रियों द्वारा हाथी, घोड़े, सैनिकों और शस्त्रों के पूजन का दिन है। आचार्य वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में दशहरे पर राजाओं द्वारा शस्त्र व अश्वपूजन का शास्त्रीय विधान प्रस्तुत किया है। यह दिन हमें मानवता की रक्षा के लिए सतत् जागरूक रहने का भी संकेत करता है। मानवीय मूल्यों और स्वाभिमान की सुरक्षा का सबसे बड़ा पाठ रामायण में मौजूद है। जिसमें भगवान श्रीराम मूल्यों को प्रतिष्ठित करने में ही लगे रहते हैं, जबकि रावण मानवता के लिए स्थापित मूल्यों का घोर विरोधी है। रामायण ने उसे ‘लोक रावण’ कहा है, यानी संसार को रूलाने वाला, जबकि राम अपने अवतार काल में ‘लोकाभिराम’ हैं। इन त्योहारों की सार्थकता ही तभी है, जब वे हमें सुधार और सृजन के लिए प्रेरित करें। विजय दशमी एक ऐसा ही उत्सव है, जिसने अनादि काल से भारतीय समाज को सम्मोहित किया हुआ है। इसी दिन मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम ने वैदिक सिद्धांतों के विरोधी, श्रीराम की भार्या सीता का हरण करने वाले दुराचारी रावण का संहार कर धर्म-ध्वज फहराया था। मानव जीवन के सर्वागीण विकास व तमाम तरह के कष्ट की मुक्ति और सफलता का पाठ पढ़ाने वाली नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की शास्त्रानुसार विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद उनके स्वरूपों का विसर्जन भी विजयदशमी के साथ होता है। शारदीया नवरात्रि शुद्धता, शुचिता और आत्म-मंथन का पर्व है। नवरात्रि में देवी अनुष्ठान एक ऐसा हेतु है, जिसकी महिमा का कोई अन्त नहीं है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी नवरात्रि अनुष्ठान के बाद ही रावण पर विजय प्राप्त की थी। विजयदशमी बुराई और असत्य पर विजय पाने का त्योहार है। यह जीवन के सभी पहलुओं और यहां तक कि उन सभी चीजों और वस्तुओं के प्रति श्रद्धा रखने के प्रतीकों से भरा हुआ है, जो मानव कल्याण में योगदान देते हैं। वैसे तो अच्छे कार्य की शुरुआत कभी भी हो सकती है। पर यह धारणा आज भी प्रबल रूप में प्रचलित है कि विजय दशमी पर किसी भी योजना-परियोजना की शुरुआत होने पर उसकी सफलता सुनिश्चित है। आज किसी भी पर्व-त्योहार की व्यावहारिकता को समझना सबसे जरूरी है। बाजार के जोर पर, धर्म के नाम पर जो दिखावा बढ़ रहा है, उसे शायद पूरी तरह रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन इतना जरूर होना चाहिए कि पर्व-त्योहार के मूल संदेश को बार-बार याद किया जाए और दूसरों को भी याद दिलाएं। विजय दशमी का यह भी संदेश है कि हर किसी को अपने जीवन में कुछ अच्छा और बड़ा करना चाहिए। अभद्रता, असत्य, अन्याय से बचते हुए हम समाज के लिए सकारात्मक शक्ति बनें। अगर हम व्यंजना में देखें, तो बड़ा रावण भले ही हजारों साल पहले काल के गाल में समा गया, पर अनेक छोटे-मझोले रावण आज भी हमें अपने आसपास दिखाई देते हैं। इनका अन्त कैसे हो, यह हमारे चिंतन का केंद्र बिन्दु हो। इन दिनों भारत के पुनः: विश्व गुरु बनने की भी जहां-तहां जोरों से चर्चा होती है, किंतु वह स्वरूप तभी साकार होगा, जब हम सामूहिक रूप से बुराई, अभद्रता, भ्रष्टाचार, गरीबी असमानता, शोषण, लिंग भेद, सांप्रदायिकता, जातिवाद जैसे रावणों का दहन करेंगे। यदि हम अपनी कमियों को दूर करने की ओर बढ़ेंगे, तो ही सही मायने में हम समाज को सत्य, सहृदयता, सद्भाव, दया, दान, अहिंसा और उपकार के लिए प्रेरित करने वाला यह विजय पर्व मना पाएंगे।

हितैषी भवन, सूरजपोल अन्दर
उदयपुर, राजस्थान
97850-39524

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