उदयपुर। खनन उद्योग को लेकर हमारे देश में एक पारंपरिक और घिसी-पिटी धारणा रही है—जमीन खोदो, धातु निकालो, शेयरधारकों को डिविडेंड दो और पर्यावरण या स्थानीय समाज के सवालों से पल्ला झाड़ लो। लेकिन आधुनिक कॉरपोरेट अर्थशास्त्र अब केवल ‘टन’ और ‘मुनाफे’ तक सीमित नहीं है। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में वही कंपनी लंबी दौड़ का घोड़ा साबित होती है, जो अपनी बैलेंस शीट के साथ-साथ समाज के ‘सोशल बैलेंस शीट’ को भी दुरुस्त रखती है। हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) द्वारा राजस्थान और उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में चलाए जा रहे सघन स्वास्थ्य शिविर इसी आधुनिक आर्थिक सोच का व्यावहारिक उदाहरण हैं।
कंपनी ने अपनी स्वास्थ्य सेवा परियोजना और सामुदायिक विकास कार्यक्रम के तहत अगूचा, चंदेरिया, जावर, दरीबा और पंतनगर जैसे अपने प्रमुख परिचालन क्षेत्रों में विशेष शिविर लगाए। ‘ममता एचआईएमसी’ के साथ मिलकर आयोजित इन शिविरों में कुल 1,263 ग्रामीणों तक विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं पहुंचाई गईं। एक अर्थशास्त्री की नजर से देखें, तो यह सिर्फ एक सीएसआर इवेंट नहीं, बल्कि हिंदुस्तान जिंक द्वारा अपने परिचालन वाले इलाकों में ‘ह्यूमन कैपिटल’ (मानव पूंजी) को मजबूत करने की सोची-समझी रणनीति है।
60% से अधिक महिलाएं: कार्यबल की रीढ़ पर हिंदुस्तान जिंक का फोकस
इस पहल का सबसे ठोस और आर्थिक रूप से प्रासंगिक पहलू लाभार्थियों का जनसांख्यिकीय वर्गीकरण (Demographic Breakdown) है। लाभान्वित हुए कुल 1,263 लोगों में 766 महिलाएं थीं, जबकि पुरुषों की संख्या 497 रही। यानी 60 फीसदी से अधिक लाभार्थी महिलाएं थीं।
ग्रामीण और आदिवासी भारत में महिलाएं कृषि, पशुपालन और घरेलू अर्थव्यवस्था की धुरी हैं, लेकिन विडंबना यह है कि परिवार में सबसे उपेक्षित स्वास्थ्य भी उन्हीं का होता है। एनीमिया (खून की कमी), पोषण का अभाव और हड्डियों की कमजोरी जैसी समस्याओं के चलते उनकी दैनिक कार्यक्षमता प्रभावित होती है। हिंदुस्तान जिंक ने अपने शिविरों में स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynecologists), हीमोग्लोबिन जांच, रक्तचाप और ब्लड शुगर जैसी बुनियादी लेकिन जीवनदायिनी जांचों को प्राथमिकता दी। जब किसी ग्रामीण परिवार की महिला स्वस्थ होती है, तो उस पूरे घर की उत्पादकता और बचत दर में सीधा सुधार आता है।
लॉजिस्टिक्स और लास्ट-माइल समाधान: स्वास्थ्य का विकेंद्रीकरण
अर्थशास्त्र में किसी भी कल्याणकारी योजना की सफलता इस बात से तय होती है कि ‘लास्ट माइल डिलीवरी’ (अंतिम छोर तक पहुंच) कितनी सुगम है। सुदूर गांवों और ढाणियों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए अस्पताल तक पहुंचना केवल डॉक्टर की फीस का मामला नहीं होता, बल्कि उसमें आने-जाने का किराया और एक दिन की मजदूरी का नुकसान भी शामिल होता है।
हिंदुस्तान जिंक ने इस बुनियादी आर्थिक अड़चन को समझा और ग्रामीणों के लिए घर-घर से शिविर तक लाने और वापस छोड़ने की परिवहन सुविधा उपलब्ध कराई। जब आप लॉजिस्टिक्स की लागत को शून्य कर देते हैं, तो सबसे गरीब और असहाय व्यक्ति भी इलाज के दायरे में आ जाता है। विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा निःशुल्क परामर्श और मौके पर ही मुफ्त दवाइयों का वितरण दरअसल ग्रामीणों को उस ‘आउट-ऑफ-पॉकेट हेल्थ एक्सपेंडिचर’ (इलाज के निजी खर्च) से बचाता है, जो ग्रामीण परिवारों को अक्सर साहूकारों के कर्ज के जाल में धकेल देता है।
निवारक स्वास्थ्य सुरक्षा: हिंदुस्तान जिंक का ‘सोशल रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’
नेत्र जांच, अस्थि रोग परामर्श और रक्त जांच जैसी सेवाएं केवल उपचारात्मक (Curative) नहीं, बल्कि निवारक (Preventive) स्वास्थ्य सुरक्षा का हिस्सा हैं। अगर किसी व्यक्ति में मोतियाबिंद, हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज की पहचान समय रहते हो जाए, तो आगे चलकर उस पर आने वाला भारी-भरकम अस्पताल का खर्च रुक जाता है।
हिंदुस्तान जिंक जैसी विशालकाय औद्योगिक इकाई के लिए स्थानीय समुदायों का विश्वास जीतना उसका सबसे बड़ा रक्षा कवच है, जिसे कॉर्पोरेट भाषा में ‘सोशल लाइसेंस टू ऑपरेट’ कहा जाता है। जमीन से सीसा, जस्ता और चांदी निकालने वाली कंपनी जब स्थानीय निवासियों को यह भरोसा दिलाती है कि उनके परिवार की सेहत कंपनी की प्राथमिकता है, तो औद्योगिक तनाव घटता है और स्थानीय स्तर पर सहयोग का माहौल बनता है।
यह पहल दर्शाती है कि हिंदुस्तान जिंक केवल धातु उत्पादन में ही देश का नेतृत्व नहीं कर रहा, बल्कि ग्रामीण और जनजातीय अंचलों में स्वास्थ्य सुरक्षा का एक टिकाऊ, सशक्त और जवाबदेह ढांचा खड़ा करने की दिशा में भी मजबूत मिसाल पेश कर रहा है।
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