उदयपुर।
हमारे देश की राजनीति में जब विचार और लोकसेवा गौण हो जाते हैं, तब फीता काटने और पत्थर पर नाम खुदवाने की होड़ किस तरह हास्यास्पद और त्रासद रूप ले लेती है, इसका ताजा प्रमाण झीलों की नगरी उदयपुर में देखने को मिला है। मेवाड़ की जिस माटी ने कभी स्वाभिमान और मर्यादा के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया, आज उसी अंचल में भारतीय जनता पार्टी के अपने ही छत्रप एक चौराहे के अधूरे विकास का सेहरा अपने सिर बांधने के लिए आपस में सरेआम भिड़ गए हैं।
शोभागपुरा चौराहे के तथाकथित लोकार्पण का यह समूचा तमाशा केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है; यह उदयपुर भाजपा के भीतर सुलग रही उस भीषण अंतर्कलह और गुटबाजी का खुला प्रदर्शन है, जिसे अब तक अनुशासन के कालीन के नीचे दबाने की नाकाम कोशिश की जा रही थी।
अधूरे चौराहे पर श्रेय की भूख: अपनों ने ही काटा अपनों का पत्ता
तथ्य बहुत सीधे और आईने की तरह साफ हैं। उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन पिछले दो वर्षों से उदयपुर विकास प्राधिकरण (UDA) के अधिकारियों और आर्किटेक्ट एसोसिएशन के साथ मिलकर इस प्रमुख चौराहे के सौंदर्यीकरण में पसीना बहा रहे थे। अभी हफ्ते भर पहले तक वे वहां खड़े होकर घटिया पत्थरों को बदलवाने के निर्देश दे रहे थे, क्योंकि काम अधूरा था।
किंतु पार्टी के ही दूसरे धड़े को शायद यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि इस काम का श्रेय शहर विधायक के खाते में जाए। फिर क्या था? 18 अक्टूबर को एक अजीबोगरीब जल्दबाजी में महापौर पारस सिंघवी, ग्रामीण विधायक फूल सिंह मीणा और शहर जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ ने मिलकर आनन-फानन में फीता काट दिया। न तो क्षेत्र के चुने हुए विधायक ताराचंद जैन को खबर दी गई, न ही निर्माण कराने वाले प्राधिकरण (UDA) के अधिकारियों को बुलाया गया।
यह कैसी दलीय निष्ठा है? जब अपनी ही पार्टी का विधायक दो साल से किसी योजना को सींच रहा हो, तब उसे किनारे धकेलकर गुपचुप तरीके से उद्घाटन कर देना क्या राजनीतिक बेईमानी और मर्यादाहीनता नहीं है?
’99 फीसदी मेरा, 1 फीसदी तेरा’: सीमा विवाद के पीछे छिपा क्षुद्र स्वार्थ
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बचकाना तर्क यह गढ़ा गया कि यह चौराहा तो शहर विधानसभा में आता ही नहीं, यह तो ग्रामीण क्षेत्र का हिस्सा है।
ताराचंद जैन ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को लिखे अपने तल्ख पत्र में इस दावे की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। उन्होंने नपे-तुले शब्दों में स्पष्ट किया कि चौराहे का 99 प्रतिशत हिस्सा विशुद्ध रूप से शहर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत है, जबकि ग्रामीण क्षेत्र (भुवाणा) का हिस्सा केवल तीन फुट की एक नाली जितना है। अब जरा सोचिए, जिस चौराहे का निन्यानवे फीसदी हिस्सा एक विधायक के अधिकार क्षेत्र में हो, वहां महज तीन फुट की नाली का बहाना बनाकर उद्घाटन कर दिया जाए, तो इसे सत्ता की भूख और गुटीय द्वेष के अलावा और क्या नाम दिया जाएगा?
संवैधानिक शिष्टाचार और पार्टी अनुशासन ताक पर
इस समूचे विवाद ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के सामने भी एक बड़ा नैतिक और प्रशासनिक प्रश्न खड़ा कर दिया है। ताराचंद जैन ने सीधे मुख्यमंत्री से पूछा है कि क्या इस लोकार्पण की कोई वैधानिक प्रशासनिक अनुमति थी? यदि UDA ने कोई हरी झंडी नहीं दी, तो फिर सरकारी संपत्ति पर इस तरह अनधिकृत तरीके से फीता काटकर जनता की आंखों में धूल झोंकने वालों पर क्या अनुशासन का डंडा चलेगा?
रही बात चौराहे के नामकरण की, तो कभी गोलवलकर जी तो कभी अमरचंद बड़वा के नाम के प्रस्ताव फाइलों में तैरते रहे। जैन का सुझाव था कि संघ के शताब्दी वर्ष में किसी महापुरुष की आदमकद प्रतिमा लगे, कार्य पूरे हों और फिर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी में विधिवत लोकार्पण हो। किंतु श्रेय लूटने की अंधी दौड़ में दौड़ रहे नेताओं के पास इतना सब्र कहां? उन्हें तो बस आगामी सियासी समीकरणों में अपनी ढपली अपना राग अलापना था।
एक आत्मघाती अंतर्कलह की शुरुआत
वेदप्रताप वैदिक के शब्दों में कहें तो राजनीति जब ‘संवाद’ के बजाय ‘षड्यंत्र’ से चलने लगे, तो वह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारती है। उदयपुर भाजपा का यह शक्ति-प्रदर्शन कोई सामान्य मतभेद नहीं है। महापौर, ग्रामीण विधायक और जिलाध्यक्ष की यह तिकड़ी यदि अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ शहर विधायक को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने पर आमादा है, तो यह संकेत है कि मेवाड़ भाजपा में अनुशासन का धागा पूरी तरह चरमरा चुका है।
अधूरे पत्थरों पर जल्दबाजी में काटे गए फीते जनता का भला नहीं करते, वे केवल सत्ताधारियों के क्षुद्र अहंकार को सहलाते हैं। यदि प्रदेश नेतृत्व ने इस अंतर्कलह पर समय रहते लगाम नहीं कसी, तो पत्थरों पर नाम चमकाने की यह सस्ती होड़ पार्टी के अपने ही वजूद पर गहरी खरोंच छोड़ जाएगी।
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