मेवाड़ की राजनीति : पहचान की जंग, चुनावी दांव और गिरती राजनीतिक भाषा

उदयपुर। उदयपुर के ओगणा में कैबिनेट मंत्री बाबूलाल खराड़ी का हालिया बयान केवल एक चुनावी भाषण नहीं है, बल्कि यह उस बेचैनी का संकेत है जो इस समय मेवाड़ और वागड़ की राजनीति में साफ देखी जा सकती है।

इस पूरे मामले के राजनीतिक मायने और ज़मीनी हकीकत को कुछ प्रमुख बिंदुओं में स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:

1. सांसद मन्नालाल रावत का मुद्दा और मंत्री की तीखी भाषा

मुद्दे की शुरुआत: मेवाड़ अंचल में ‘आदिवासी बनाम हिंदू’ पहचान का मुद्दा नया नहीं है। उदयपुर के सांसद डॉ. मन्नालाल रावत लंबे समय से इस बहस को आगे बढ़ाते रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि जनजातीय समाज की परंपराएं और आस्था सनातन संस्कृति से जुड़ी हैं।

मंत्री का आक्रामक रुख: पंचायतीराज चुनावों के मुहाने पर आकर कैबिनेट मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने सांसद रावत के इसी मुद्दे की कमान संभाली। फर्क सिर्फ इतना रहा कि जहां सांसद इसे वैचारिक स्तर पर रखते थे, वहीं मंत्री ने इसे बेहद कड़े और आक्रामक शब्दों में पेश किया।

2. बयानों पर उठते सवाल

संवैधानिक पद की मर्यादा: एक जिम्मेदार पद पर रहते हुए यह कहना कि ‘जो खुद को हिंदू न मानें, उनका गांव में मुंह काला कर बाहर निकाल दो’, सीधे तौर पर लोकतांत्रिक संवाद और कानून के दायरे से बाहर चला जाता है।

परंपरा और सियासत का टकराव: नवरात्र, देवरे (स्थानीय पूजा स्थल) और लोक-परंपराओं का उल्लेख कर जनभावनाओं को छूने का प्रयास अपनी जगह है, लेकिन इसके आधार पर किसी भी वर्ग या सोच के सामाजिक बहिष्कार की बात करना एक संवेदनशील अंचल में आपसी कटुता को बढ़ा सकता है।

3. इस आक्रामकता के पीछे का सियासी समीकरण

क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव: वागड़ और मेवाड़ में ‘भारत आदिवासी पार्टी’ (BAP) और अन्य स्थानीय संगठनों द्वारा अपनी अलग पहचान का विमर्श खड़ा करने से भाजपा के पारंपरिक जनाधार में हलचल हुई है।

ध्रुवीकरण का चुनावी प्रयास: पंचायतीराज चुनाव-2026 में वोटों के बिखराव को रोकने के लिए भावनात्मक और सांस्कृतिक मुद्दों को मुख्य चुनावी हथियार बनाया जा रहा है। ‘पार्टियां आएंगी-जाएंगी, संस्कृति रहनी चाहिए’ जैसी बातें असल में इसी ध्रुवीकरण को मजबूत करने की कोशिश हैं।

लोकतंत्र में हर समुदाय को अपनी पहचान, संस्कृति और विचारों को रखने का संवैधानिक हक है। जब राजनीतिक दल इन सवालों का समाधान वैचारिक बहस के बजाय सामाजिक टकराव और कटुता भरे बयानों से करने लगते हैं, तो तात्कालिक चुनावी लाभ चाहे जो मिले, लंबे समय में इसका नुकसान समाज के ताने-बाने को ही उठाना पड़ता है।

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