उदयपुर। भारत की वास्तविक शक्ति किसी राजधानी के नीतिगत दस्तावेजों में नहीं, बल्कि उन सुदूर देहातों में सांस लेती है जहां की बहनें अपने पसीने और पारंपरिक हुनर के बल पर स्वाभिमान का नया इतिहास लिखती हैं। राजस्थान के उदयपुर और आसपास के ग्रामीण अंचलों से आ रही यह खबर बताती है कि यदि समाज और उद्योग मिलकर सही दिशा में अवसर प्रदान करें, तो हमारी ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भरता का कितना भव्य प्रतिमान स्थापित कर सकती हैं।
हिंदुस्तान जिंक की ‘सखी माइक्रोएंटरप्राइज’ परियोजना से जुड़ी 420 से अधिक ग्रामीण महिलाओं ने जो कर दिखाया है, वह आधुनिक भारत के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है। किसी भी परिवार के लिए आर्थिक स्थिरता का क्या महत्व होता है, इसे मंजू देवी के संघर्ष से भली-भांति समझा जा सकता है। वर्ष 2019 में जीवनसाथी के असमय चले जाने के बाद जब दो मासूम बच्चों के लालन-पालन का भार उनके कंधों पर आ पड़ा, तब मौसमी मजदूरी की अनिश्चितताओं के बीच वे टूटी नहीं। आज वही मंजू देवी आधुनिक प्रोसेसिंग मशीनों का संचालन कर प्रतिमाह लगभग 8 हजार रुपये की गरिमापूर्ण आय अर्जित कर रही हैं और समूचे क्षेत्र के लिए एक प्रेरणा बन चुकी हैं।
आंकड़ों में स्वावलंबन की गवाही : आय में 43 प्रतिशत की उछाल
यह केवल किसी एक मंजू देवी की व्यथा और विजय की गाथा नहीं है, बल्कि 426 ‘सखी दीदियों’ के सामूहिक पुरुषार्थ का परिणाम है।
सामूहिक आय में वृद्धि : इन कर्मठ महिलाओं की सामूहिक आय में पिछले वर्ष की तुलना में 43 प्रतिशत की ठोस वृद्धि दर्ज की गई है।
वित्त वर्ष 2026 की उपलब्धि : यह आय 23 लाख रुपये से बढ़कर अब 32.84 लाख रुपये के स्तर पर पहुंच चुकी है, जो यह स्पष्ट करती है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जब संगठित आधार मिलता है, तो परिणाम कितने उत्साहवर्धक होते हैं।
‘दायची’ और ‘उपाया’ : परंपरा, पोषण और आधुनिक बाजार का अनूठा संगम
सखी बहनों का यह उद्यम केवल आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के पारंपरिक खान-पान और हस्तशिल्प को पुनर्जीवित करने का एक पावन प्रयास भी है।
विविध उत्पाद श्रृंखला : ‘दायची’ ब्रांड के माध्यम से शुद्ध मसाले, दालें, शहद, आचार, मूंगफली तेल और घी जैसे पारंपरिक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जबकि ‘उपाया’ ब्रांड ग्रामीण महिलाओं की वस्त्र निर्माण और क्रोशिया कला को नई पहचान दे रहा है।
दरीबा में मिलेट इकाई : स्वास्थ्य और पर्यावरण के अनुकूल ‘श्रीअन्न’ (मिलेट) को बढ़ावा देने के लिए दरीबा में स्थापित नई मिलेट उत्पादन इकाई से स्थानीय पोषक अनाजों का मूल्य संवर्धन हो रहा है, जिससे पोषण सुरक्षा और रोजगार दोनों एक साथ सध रहे हैं।
महानगरों तक सीधी पहुंच : राजस्थान और उत्तराखंड की 14 उत्पादन इकाइयों में तैयार ये उत्पाद अब केवल गांवों तक सीमित नहीं हैं। ‘ले मार्शे’ के जरिए दिल्ली के आधुनिक स्टोर्स से लेकर ब्लिंकिट, अमेजन, फ्लिपकार्ट, ओएनडीसी और उनके अपने प्लेटफॉर्म ‘हार्ट्स विद फिंगर्स’ तक पहुंच चुके हैं। ग्रामीण उत्पादकों को बिचौलियों के बिना सीधे शहरी उपभोक्ताओं से जोड़ने की यह व्यवस्था बेहद सराहनीय है।
जब देश का कोई बड़ा औद्योगिक समूह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) को महज खानापूर्ति न मानकर 4,100 से अधिक गांवों के 26 लाख लोगों तक समावेशी विकास की किरणें पहुंचाता है, तो उससे राष्ट्र निर्माण की वास्तविक नींव मजबूत होती है। महात्मा गांधी ने जिस ‘ग्राम स्वराज्य’ और पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने जिस ‘अंत्योदय’ की कल्पना की थी, उसका वास्तविक स्वरूप यही है कि समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ी बहन के हाथ में हुनर हो, चेहरे पर स्वाभिमान हो और उसके बनाए उत्पाद देश की मुख्यधारा के बाजारों में अपनी पहचान बनाएं। सखी परियोजना का यह प्रयास भारतीय नारी के अदम्य साहस और ग्रामीण स्वावलंबन का एक अत्यंत उज्ज्वल अध्याय है।
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