उदयपुर के 451 साल पुराने महालक्ष्मी मंदिर में सवा 8 लाख की पोशाक : कमल नहीं, गुप्त सफेद हाथी पर विराजती हैं माता, भोर से उमड़ा आस्था का सैलाब

सैयद हबीब, उदयपुर।
सुबह चार बजे का वक़्त भी अजीब होता है…
न रात पूरी तरह रुख़सत होती है, न दिन ने अभी अपनी पहली उबासी ली होती है।
उदयपुर की पुरानी गलियों में, भटियाणी चौहट्टे की सर्द सी हवा पर ताज़े कमल और चंदन की ख़ुशबू तैर रही थी। साढ़े चार सौ बरस पुरानी दहलीज़ पर नंगे पांव खड़े लोग, सिर्फ़ हाथ जोड़े खड़े नहीं थे… वे अपनी-अपनी झोलियों में साल भर की उम्मीदें, कुछ अनकही मांगें और मुट्ठी भर रोशनी समेटे आए थे।
अजीब रिश्ता है आदमी का इस चौखट से। साढ़े चार सौ साल गुज़र गए, ज़माने बदल गए, रियासतें ख़्वाब हो गईं… मगर आस्था वहीं की वहीं ठहरी रही, जैसे किसी पुराने ताक़ में जलता हुआ दीया।
दीपावली की इस भोर में महालक्ष्मी का अभिषेक हुआ। सवा आठ लाख की सोने-चांदी की ज़री से बुनी पोशाक माता के तन पर सजी, सोने के जेवरात चमके, ताज़े खिले कमल के फूलों से श्रृंगार महक उठा। लेकिन सच पूछिए, तो उस दरबार में कीमत सोने-चांदी की नहीं थी, कीमत तो उन भीगी आँखों की थी, जो गर्भगृह के झरोखे से उस ममतामयी चेहरे को तक रही थीं।
और इस मंदिर का एक राज़ है… जो आंखों से ओझल होकर भी दिल को छूता है।
कहते हैं, दुनिया भर में मां लक्ष्मी कमल के फूल पर बैठती हैं, लेकिन यहां वे सफ़ेद संगमरमर के एक हाथी की पीठ पर सवार हैं। पर उस हाथी को कोई देख नहीं पाता। वह हमेशा माता के आंचल और रेशमी पोशाक की ओट में छुपा रहता है। ठीक वैसे ही, जैसे ज़िंदगी में सबसे बड़ा सहारा कभी दिखाई नहीं देता, बस महसूस होता है। सिर्फ़ पुजारी, जब भोर के सन्नाटे में पोशाक बदलते हैं, उस छुपे हुए आधार का दीदार करते हैं। बाक़ी दुनिया के लिए वह एक यक़ीन है—कि कोई अनदेखी ताक़त है, जिसने मां को और हम सबको थाम रखा है।
दिन चढ़ा, तो राजसी रिवायतें भी उस चौखट पर अपना सिर झुकाने चली आईं। लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ अपने परिवार और लवाजमे के साथ आए। राजसी ठाठ-बाट अपनी जगह, पर मां की मूरत के आगे तो हर कोई सिर्फ़ एक बच्चा होता है—हाथ जोड़े, नतमस्तक।
मंदिर के ट्रस्टी जतिन श्रीमाली जब बताते हैं कि दस नवंबर को यहां विशेष अन्नकूट का आयोजन होगा और शाम को महाआरती की जाएगी, तो लगता है कि ये सिर्फ़ किसी उत्सव की तारीख़ नहीं, बल्कि इस शहर के सदियों पुराने सिलसिले की एक और कड़ी है जो यूँ ही जुड़ती चली जाएगी। आज, दीयों की इस रात में, भटियाणी चौहट्टे से लेकर जगदीश चौक तक की रोशनियों के बीच, न जाने कितने परदेसी और मुक़ामी लोग उस चौखट से कुछ ऐसी रौशनी बटोर कर ले गए, जो किसी बाज़ार में नहीं बिकती।
शायद इसी को भरोसा कहते हैं…
जो दिखाई न दे, फिर भी हर अंधेरे में रास्ता दिखा दे।
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