
जोधपुर/उदयपुर ।
राजस्थान हाई कोर्ट ने उदयपुर की ऐतिहासिक झीलों, नहरों और जल निकायों पर हो रहे अवैध कब्जों (अतिक्रमण) और उनके लगातार हो रहे क्षरण पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है. जनहित में एक बड़ा कदम उठाते हुए हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस गंभीर मामले पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लिया है. कोर्ट ने ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ और संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए उदयपुर की सभी झीलों में किसी भी प्रकार के नए अतिक्रमण, निर्माण या प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाते हुए ‘यथास्थिति’ (Status Quo) बनाए रखने के आदेश दिए हैं.
न्यायाधीश पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायाधीश रेखा बोराणा की खंडपीठ ने इस मामले को एक जनहित याचिका (PIL) के रूप में पंजीकृत करने का निर्देश दिया है, जिसे ‘उदयपुर में झीलों और जल निकायों का संरक्षण और सुरक्षा बनाम राजस्थान राज्य’ नाम दिया गया है.
समाचार पत्रों की रिपोर्ट पर अदालत ने व्यक्त की चिंता
हाई कोर्ट ने मीडिया रिपोर्टों को आधार बनाया है. इन खबरों में उदयपुर की लाइफलाइन मानी जाने वाली झीलों की दुर्दशा को उजागर किया गया था:
रूपसागर तालाब : सीमा विवाद और अनसुलझे सीमांकन के कारण यह तालाब अतिक्रमण की चपेट में है.
मदार नहर : नहर की दीवारों में बार-बार ढांचागत विफलता और मरम्मत की कमी से जल संकट बढ़ रहा है.
फतहसागर झील: पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील इस क्षेत्र के बेहद करीब अनियंत्रित व्यावसायिक और विकास गतिविधियां चल रही हैं.
अदालत ने स्पष्ट किया कि ये मुद्दे किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पूरे शहर के जल प्रबंधन ढांचे और पारिस्थितिकी तंत्र की विफलता को दर्शाते हैं.
“भावी पीढ़ियों के लिए झीलों को बचाना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य”
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर बेहद महत्वपूर्ण और दार्शनिक टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा :-“उदयपुर की झीलें केवल पानी के गड्ढे या जल निकाय नहीं हैं, बल्कि वे एक जीवित प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत हैं, जिन्होंने सदियों से इस क्षेत्र के इतिहास, अर्थव्यवस्था और चेतना को गढ़ा है. दक्षिणी राजस्थान जैसे जल-तनाव वाले क्षेत्र में इन जीवनदायिनी संसाधनों का क्षरण या प्रदूषण बेहद विनाशकारी सामाजिक और पर्यावरणीय परिणाम ला सकता है.”
संविधान के इन अनुच्छेदों का दिया हवाला :
अनुच्छेद 21 : प्रत्येक नागरिक को एक स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण में जीने का मौलिक अधिकार देता है.
अनुच्छेद 48-A : राज्य सरकार का यह कर्तव्य तय करता है कि वह पर्यावरण, वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों की रक्षा करे.
अनुच्छेद 51-A(g) : देश के हर नागरिक का यह बुनियादी नैतिक दायित्व है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण को सुधारे और उसका संरक्षण करे.
पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन : इसके अनुसार, देश के महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन जनता की अमानत हैं, जिन्हें राज्य सरकार केवल एक ट्रस्टी के रूप में संभालती है. निष्क्रियता के कारण इन्हें नष्ट होने नहीं दिया जा सकता.
हाई कोर्ट द्वारा जारी अंतरिम निर्देश और मुख्य बिंदु : अदालत ने राज्य सरकार और उदयपुर के स्थानीय प्रशासन सहित 11 संबंधित प्राधिकरणों को नोटिस जारी कर विस्तृत हलफनामा और समन्वित स्टेटस रिपोर्ट (Coordinated Status Report) पेश करने के आदेश दिए हैं. इसके साथ ही कोर्ट ने निम्नलिखित अंतरिम निर्देश जारी किए हैं:
सीवेज पर रोक : किसी भी झील या कैचमेंट एरिया में बिना ट्रीट किया हुआ गंदा पानी (Untreated Sewage) नहीं बहाया जाएगा.
नक्शा और सीमांकन : झीलों, नहरों, फीडर चैनलों और जलग्रहण क्षेत्रों की मैपिंग और सटीक सीमांकन (Demarcation) की मौजूदा स्थिति की समीक्षा की जाए.
कमर्शियल गतिविधियों की जांच: झीलों के पास स्वीकृत या प्रस्तावित व्यावसायिक परियोजनाओं के कानूनी और पर्यावरणीय पहलुओं की जांच हो.
जल गुणवत्ता मूल्यांकन : समय-समय पर पानी की गुणवत्ता की जांच की जाए.
शॉर्ट व लॉन्ग टर्म प्लान: झीलों के जीर्णोद्धार और दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए एक ठोस कार्ययोजना तैयार की जाए.
मामले में अदालत की सहायता करने के लिए हाई कोर्ट ने अविन छंगानी, शुभम ओझा और मुदित नागपाल को न्यायमित्र (Amicus Curiae) नियुक्त किया है. इस अति-महत्वपूर्ण पर्यावरण संरक्षण मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को तय की गई है.
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