
उदयपुर। अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व को बचाने के लिए लंबे समय से संघर्षरत उदयपुर के प्रकृति शोध संस्थान (Prakriti Research Society) के प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सफलता मिली है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अरावली की परिभाषा तय करने के लिए गठित 10 सदस्यीय उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति (HPEC) में संस्थान के राजस्थान स्टेट को-ऑर्डिनेटर और प्रख्यात भूगोलवेत्ता प्रोफेसर आर.एन. मिश्रा को सदस्य के रूप में नामित किया है।
संस्थान के प्रमुख प्रो. पी.आर. व्यास ने जताया हर्ष
प्रकृति शोध संस्थान के प्रमुख और वरिष्ठ भूगोलवेत्ता प्रोफेसर पी.आर. व्यास ने इस नियुक्ति को संस्थान की वैचारिक जीत बताते हुए कहा कि यह हमारे लिए अत्यंत गर्व का विषय है। प्रो. मिश्रा प्रकृति शोध संस्थान के स्टेट कॉर्डिनेटर भी हैं। प्रो. व्यास ने कहा कि “संस्थान लंबे समय से राष्ट्रीय मंचों पर अरावली के अवैध खनन और इसकी लुप्त होती पहचान के मुद्दों को उठाता रहा है। प्रो. आर.एन. मिश्रा का इस राष्ट्रीय समिति में शामिल होना संस्थान के शोध और अरावली संरक्षण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता की जीत है। उनकी विशेषज्ञता, विशेषकर ‘ट्रीज ऑफ राजस्थान’ जैसे उनके कार्यों का लाभ अब पूरे देश को मिलेगा।”
अरावली की माइनिंग पर प्रोजेक्ट सौंपेगा संस्थान
प्रो. पी.आर. व्यास ने भविष्य की रणनीति साझा करते हुए बताया कि प्रकृति शोध संस्थान अब इस दिशा में और अधिक आक्रामक तरीके से कार्य करेगा। संस्थान जल्द ही राजस्थान सरकार को अरावली क्षेत्र में हो रही खनन गतिविधियों (Mining Activities) के पारिस्थितिक प्रभाव और उनके वैज्ञानिक समाधान को लेकर एक ‘मेजर प्रोजेक्ट’ पेश करेगा। इसका उद्देश्य विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना है।
समिति की भूमिका और प्रो. मिश्रा का योगदान
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एफिडेविट के अनुसार, यह समिति अरावली की एक वैज्ञानिक और सर्वमान्य परिभाषा तय करेगी। प्रो. आर.एन. मिश्रा, जिन्हें क्षेत्रीय भूगोल का गहरा ज्ञान है, समिति में राजस्थान के प्रतिनिधित्व को मजबूती देंगे।
समिति के प्रमुख सदस्यद:
अध्यक्ष : कंचन देवी (महानिदेशक, ICFRE)
सदस्य : प्रो. आर.एन. मिश्रा (PRSU उदयपुर), राजेंद्र कुमार शर्मा (पूर्व निदेशक, GSI), सुभाष आशुतोष (पूर्व महानिदेशक, FSI) सहित अन्य विशेषज्ञ।
प्रो. मिश्रा की इस उपलब्धि पर उदयपुर ही नहीं राजस्थान के शैक्षणिक जगत और पर्यावरण प्रेमियों में खुशी की लहर है। संस्थान के सदस्यों का मानना है कि 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पैनल को अंतिम रूप दिए जाने के बाद, अरावली के संरक्षण कार्य में एक नए और वैज्ञानिक युग की शुरुआत होगी।
स्थानीय विशेषज्ञता को राष्ट्रीय मंच : प्रकृति शोध संस्थान, उदयपुर ही नहीं राजस्थान के विशेषज्ञों का राष्ट्रीय समितियों में पहुँचना यह दर्शाता है कि अरावली जैसे संवेदनशील मुद्दों पर स्थानीय शोध और जमीनी सच्चाई की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।
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