उदयपुर निगम में डिप्टी मेयर दिनेश भट्ट : सालगिरह का जश्न, दिन में तारे और सियासत का सब्र

आप पढ़ रहे हैं हबीब और कमल कुमावत की रिपोर्ट

6 अक्टूबर की शाम उदयपुर में डिप्टी मेयर दिनेश भट्ट के घर का मंजर देखने लायक था। मौका दोहरी खुशी का था—हाल ही में मिली चुनावी जीत की ताजा खुमारी और उनका जन्मदिन। फूलों के गुलदस्तों, मिठाई के डिब्बों और समर्थकों के ठहाकों के बीच यह सिर्फ एक सालगिरह का जलसा नहीं था, बल्कि उस पुराने वफादार सिपाही का सम्मान था जिसने पार्टी के लिए अपनी जिंदगी खपा दी।

लेकिन जो बात मुझे सबसे ज्यादा भाई, वह थी जन्मदिन की इस महफिल में भट्ट साहब का वो ठेठ और बेबाक अंदाज, जो आज के सियासी दौर में कम ही सुनने को मिलता है। अमूमन हमारे मुल्क में पद मिलते ही नेताजी यह मान बैठते हैं कि कायनात उन्हीं के दम पर चल रही है। मगर दिनेश भट्ट ने जब माइक थामा, तो अपने कार्यकर्ताओं के बीच बिल्कुल दिल खोलकर रख दिया। कोई बनावटी लफ्फाजी नहीं, बल्कि सियासत की सच्ची और कच्ची किस्सागोई।

उन्होंने मुस्कुराते हुए महफिल में वो राज भी खोला कि पहली बार चुनावी मैदान में उतरते वक्त उनके टिकट से किसका पत्ता कटा, उन्होंने उसे कैसे मनाया और खुद उनका टिकट अतीत में कितनी बार ऐन वक्त पर काटा गया था।

वे बोले, “सियासत बड़ी बेरहम महबूबा है। यह आपका पसीना और न जाने कितनी शामें मांग लेती है, लेकिन यहां सब्र ही सबसे बड़ी पूंजी है। मैंने कभी पार्टी की चौखट नहीं छोड़ी, बस निष्ठा से काम करता रहा।”

और सबसे मजेदार बात तो उन्होंने तब कबूली जब वे चुनाव की जद्दोजहद बयां कर रहे थे। उन्होंने खिलखिलाते हुए कहा, “मैंने अपनी पूरी जिंदगी में न जाने कितनों को उंगली पकड़कर पार्षद की कुर्सी तक पहुंचा दिया, लेकिन जब खुद अपने लिए वोट मांगने गली-गली घूमा, तो दिन में तारे नजर आ गए!”

यह स्वीकारोक्ति अपने आप में कमाल की है। दूसरों के लिए मंच सजाना आसान होता है, लेकिन जब खुद की प्रतिष्ठा दांव पर हो, तो पसीना छूटना लाजिमी है। उन्होंने अपने उन कार्यकर्ताओं का तहेदिल से शुक्रिया अदा किया जिन्होंने धूप-छांव की परवाह किए बिना रात-दिन एक कर दिया था।

दिनेश भट्ट की यह दास्तान भारतीय लोकतंत्र के उस आम कार्यकर्ता की कहानी है, जो बरसों कतार में खड़ा रहता है। इस जन्मदिन पर जब कार्यकर्ताओं ने उन्हें घेरा, तो जश्न सिर्फ एक उम्र के पड़ाव या कुर्सी का नहीं था; वह उस ‘धैर्य’ का जश्न था जो आज की अवसरवादी राजनीति में सबसे दुर्लभ हो चुका है।

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