
सैयद हबीब, उदयपुर
हॉलीवुड की फ़िल्मी दुनिया और ग्लैमर के बाज़ार का यह पुराना दस्तूर रहा है कि वह हर चीज़ को एक तिलिस्म बना देता है—ऐसा तिलिस्म, जिसमें इंसान अपनी हक़ीक़त भूलकर केवल चमक की ओर खिंचता चला जाता है। रविवार की रात ‘सिटी ऑफ़ एंजेल्स’ यानी लॉस एंजिल्स के सोनी पिक्चर्स स्टूडियोज़ में जब विक्टोरियाज़ सीक्रेट फ़ैशन शो 2026 का पर्दा उठा, तो वह सिर्फ़ परिधानों और मॉडल्स का जमावड़ा नहीं था; वह आधुनिक पूंजीवाद, औरत की देह और बाज़ार की बेपनाह नुमाइश का एक महानाटक था।
गिगी हदीद और कैंडिस स्वानपॉल जैसी दिग्गज सुपरमॉडल्स ने जब रनवे पर अपने कदम रखे, तो तालियों की गड़गड़ाहट में बहुत कुछ ऐसा था जो महज़ चकाचौंध के पीछे छिप गया। लेकिन सिनेमा और समाज को करीब से देखने वाली नज़र हमेशा यह परखने की कोशिश करती है कि रोशनी के इस समंदर में असल मानवीय दास्तानें क्या हैं।
बिना धागे का लिबास और पचास मिलियन डॉलर का तराशा हुआ पत्थर
इस तमाशे का सबसे बड़ा केंद्र रहा वह ‘फैंटेसी ब्रा’, जिसे साल 2018 के बाद पहली बार रनवे पर उतारा गया। मशहूर ज्वेलरी घराने ‘जैकब एंड कंपनी’ ने 15 कारीगरों की एक हज़ार घंटों की मेहनत से इसे गढ़ा। कीमत आंकी गई पचास मिलियन डॉलर—यानी चार सौ पंद्रह करोड़ रुपये से भी अधिक।
आश्चर्य यह कि इस लिबास में कपड़े या सूत का एक रेशा तक नहीं था; थे तो सिर्फ़ 1,373 कैरेट के 4,410 हीरे, जिनके ठीक दरमियान 75.54 कैरेट का एक दुर्लभ पीला हीरा (फैंसी विविड येलो डायमंड) झूल रहा था। इसे पहनकर उतरीं 29 बरस की काइली जेनर, जिनका इस मंच पर यह पहला कदम था।
यह दृश्य मुझे सिनेमा के उन भव्य सेट्स की याद दिलाता है जहाँ इंसान से ज़्यादा क़ीमती वो पत्थर हो जाते हैं जो उसने ओढ़ रखे हैं। जिस दौर में दुनिया के बड़े हिस्से में बुनियादी ज़रूरतें मुकम्मल नहीं होतीं, वहाँ बिना कपड़े के हीरों से ढकी देह को कला और फ़ैशन का शिखर बता दिया जाता है। यह बाज़ार का वही तिलिस्म है, जो अभाव और अतिरेक के बीच एक भयानक खाई खोदकर उस पर रोशनी की चादर बिछा देता है।
मातृत्व की थकान पर हावी प्रोफेशनलिज़्म: छह हफ़्ते बाद रनवे पर बारबरा
लेकिन इस कृत्रिम रोशनी के बीच एक ऐसा प्रसंग भी था जो औरत के वजूद, उसकी जिजीविषा और आज के दौर की क्रूर कार्यसंस्कृति को बयां कर गया। 33 वर्षीय सुपरमॉडल बारबरा पाल्विन ने ठीक छह हफ्ते पहले अपने पहले बेटे को जन्म दिया था। अपने पति डायलन स्प्रूस के साथ मातृत्व का सुख बांटने के महज बयालीस दिन बाद, वे हाई हील्स पहनकर उसी रनवे पर मुट्ठी भींचे उतरीं।
जब उनसे बैकस्टेज पूछा गया, तो उन्होंने इसे ‘सशक्त’ अनुभव बताते हुए एक बेहद कड़वी सच्चाई कह दी—“अमेरिका में तो ज़्यादातर कामकाजी औरतों को छह हफ़्ते बाद काम पर लौटना ही पड़ता है।”
यह वाक्य केवल एक मॉडल का अनुभव नहीं है, बल्कि उस क्रूर कॉरपोरेट व्यवस्था पर एक गहरा तंज़ है जहाँ मातृत्व की कोमलता को भी आराम की मोहलत नहीं मिलती। बारबरा ने पिछले साल भी पैर टूटने के चार हफ्ते बाद हील्स पहनकर वॉक किया था। इसे आप किसी कलाकार का समर्पण कह सकते हैं, परदे पर मुस्कुराते रहने की मजबूरी कह सकते हैं, या फिर ग्लैमर की दुनिया का वह नियम—जहाँ ‘शो मस्ट गो ऑन’ का नारा इंसान की हड्डियों और जज़्बातों से ज़्यादा भारी पड़ता है।
फैशन का यह कारवां लॉस एंजिल्स से गुज़रकर ख़त्म हो गया। तस्वीरों में सिर्फ़ चमचमाते हीरे, मुस्कुराते चेहरे और परों वाले फ़रिश्ते दिखाई देंगे। लेकिन परदे के पीछे झांकें तो समझ आता है कि ग्लैमर की यह नगरी जितनी दिलकश बाहर से दिखती है, अंदर से उतनी ही बेरहम और कारोबारी है—जहाँ इंसान अपने दर्द को छिपाकर मुस्कुराने के लिए अभिशप्त है, ताकि टिकट खिड़की और विज्ञापनों का बाज़ार कभी ठंडा न पड़े।
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