
कोटा। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने एक बार फिर प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोटा में गौ-संरक्षण को लेकर चल रहे प्रदर्शन के दौरान उनका अचानक रुकना केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि जनभावनाओं से जुड़े एक संवेदनशील मुद्दे पर सीधा हस्तक्षेप माना जा रहा है।
वसुंधरा राजे ने स्वयं को सनातनी बताते हुए यह स्पष्ट किया कि गौमाता के संरक्षण में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि पिछले कई दिनों से लोग आवाज़ उठा रहे हैं, लेकिन प्रशासन पूरी तरह उदासीन बना हुआ है। “जनता चुस्त है और अफ़सर सुस्त हैं”—यह बयान केवल शब्द नहीं, बल्कि मौजूदा प्रशासनिक ढिलाई पर तीखा प्रहार है।
गौरक्षकों द्वारा लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं। उनका कहना है कि कोटा में मृत गायों का सम्मानजनक अंतिम संस्कार नहीं किया जा रहा और कुछ मामलों में मृत गायों की आड़ में जीवित गायों की हत्या कर गौमांस बेचा जा रहा है। यह न सिर्फ धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय है, बल्कि कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का भी बड़ा प्रश्न है।
वसुंधरा राजे ने मौके पर ही कोटा रेंज के डीआईजी राजेंद्र गोयल और एसपी तेजस्विनी गौतम को बुलाकर सख्त निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मामले की गहन जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। अधिकारियों द्वारा दोषियों को दंड देने और गौमाता के विधिपूर्वक अंतिम संस्कार का आश्वासन देना प्रशासन पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर जनता की अपेक्षाएं अब सीधे जनप्रतिनिधियों से जुड़ रही हैं। प्रशासन की निष्क्रियता राजनीतिक हस्तक्षेप को मजबूर कर रही है। यदि समय रहते व्यवस्था नहीं सुधरी, तो ऐसे मुद्दे सामाजिक असंतोष का रूप ले सकते हैं।
यह पूरा घटनाक्रम न केवल गौ-संरक्षण बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, संवेदनशीलता और सुशासन पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
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