
उदयपुर।
अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर आयोजित संगोष्ठी में आज कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए। विशेषज्ञों और विषय-वक्ताओं ने एकमत से कहा कि अरावली के सीमांकन का आधार केवल ऊँचाई नहीं हो सकता। इसके लिए बेस लाइन, ढाल (ग्रेडिएंट) तथा भू-आकृतिक प्रोफाइल जैसे वैज्ञानिक मानकों को भी शामिल किया जाना आवश्यक है।
संगोष्ठी में यह भी कहा गया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित 100 मीटर ऊँचाई के मानदंड पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए, ताकि अरावली की वास्तविक भौगोलिक संरचना और पर्यावरणीय महत्व को बेहतर ढंग से परिभाषित किया जा सके।
बैठक में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि उदयपुर में “अरावली रिसर्च इंस्टीट्यूट” की स्थापना की जाए, जिससे देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला के संरक्षण, शोध और सतत विकास से जुड़े कार्यों को वैज्ञानिक आधार मिल सके।
वक्ताओं ने कहा कि अरावली केवल एक प्राकृतिक संरचना नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक रूप से आहड़ सभ्यता का प्रमुख केंद्र रही है। इसलिए इसे सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से जियो-हेरिटेज (भौगोलिक विरासत) के रूप में संरक्षित करना समय की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को इसके महत्व से अवगत कराया जा सके।
प्रो. पीआर व्यास ने कहा-अरावली को जियो-हेरिटेज बताते हुए कहा कि यहां हुए अंधाधुंध निर्माण आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट पैदा करेंगे। वहीं इंटैक के पूर्व कन्वीनर प्रो. बी.पी. भटनागर ने खनन की आवश्यकता स्वीकार करते हुए भी पर्यावरणीय पुनर्स्थापन (Reclamation) की वैज्ञानिक योजना को अनिवार्य बताया।
सामाजिक दृष्टि से भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है। वक्ताओं ने कहा कि जिस तरह अरावली के विनाश ने जल संकट, जलवायु असंतुलन और जैव विविधता पर असर डाला है, उसे देखते हुए समाज को भी एकजुट होना होगा। यही कारण है कि अब उदयपुर, जिसने इस विवादित परिभाषा को जन्म दिया था, वही इसके सुधार का केंद्र बन रहा है।
यह पूरी बहस इस ओर संकेत करती है कि अरावली को लेकर नीति-निर्माण अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी का विषय बन चुका है।
सुखाड़िया विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. विनोद अग्रवाल, डॉ. पी. आर. व्यास, प्रो. सीमा जालान तथा डॉ. अनिल मेहता ने स्पष्ट किया कि अरावली और हिमालय जैसी पर्वतमालाएं वैश्विक स्तर पर विशिष्ट हैं, जिन पर सामान्यीकृत परिभाषाएं लागू नहीं की जा सकतीं। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीकों जैसे जियो-स्पेशियल टेक्नोलॉजी, रिमोट सेंसिंग और GIS के दौर में केवल ऊंचाई आधारित मापदंडों का प्रयोग आश्चर्यजनक है।
विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि अरावली केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक, आध्यात्मिक और पारिस्थितिक विरासत का केंद्र है। यह क्षेत्र आहड़ सभ्यता का भी प्रमुख केंद्र रहा है, जो इसे जियो-हेरिटेज का दर्जा देता है।
वक्ताओं ने चेताया कि निर्माण गतिविधियों और पहाड़ियों की कटाई से अरावली को गंभीर क्षति पहुंच रही है। वहीं इंटैक के पूर्व कनवीनर और पूर्व कुलपति प्रो. बी.पी. भटनागर ने कहा कि खनन की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उसके लिए वैज्ञानिक पुनर्स्थापन (Reclamation) नीति अनिवार्य होनी चाहिए।
संगोष्ठी में सर्वसम्मति से यह निष्कर्ष निकला कि : अरावली के सीमांकन का आधार केवल ऊँचाई नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट के 100 मीटर संबंधी निर्णय पर पुनर्विचार आवश्यक है। उदयपुर में अरावली रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की जानी चाहिए।
अरावली को प्राकृतिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाए।
Keywords: Aravalli Range, Richard Murphy Definition, 100 Meter Rule, Udaipur Seminar, Environmental Protection, Aravalli Conservation, Geological Studies, Sustainable Development, Indian Ecology
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