
उदयपुर। राष्ट्रीय पर्यटन दिवस के अवसर पर रविवार को झीलों की नगरी उदयपुर में ‘सतत और जिम्मेदारीपूर्ण पर्यटन’ पर एक विशेष संवाद का आयोजन किया गया। इस दौरान विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने स्पष्ट किया कि पर्यटन व्यवसाय की सफलता उसकी निरंतरता में है, जो केवल प्रकृति, संस्कृति और विरासत के संरक्षण से ही संभव है।
फतेहसागर नाइट मार्केट पर गहराया विवाद
संवाद में झील संरक्षण समिति के डॉ. अनिल मेहता ने फतेहसागर झील पर संचालित नाइट मार्केट और चौपाटी जैसी व्यावसायिक गतिविधियों पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि ये गतिविधियां नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के निर्देशों की अवहेलना और वेटलैंड संरक्षण नियमों के विरुद्ध हैं।
डॉ. मेहता ने चेतावनी दी कि रानी रोड ‘सज्जनगढ़ इको सेंसिटिव ज़ोन’ के भीतर आती है, जहाँ व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ाना न्यायालय की अवमानना है। यह उदयपुर को ‘रामसर वेटलैंड सिटी’ बनाने के मूल उद्देश्यों को भी चोट पहुँचाता है।
पर्यटन के नाम पर पहचान और स्वास्थ्य से खिलवाड़
पेयजल सुरक्षा: झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि झीलें पेयजल का मुख्य स्रोत हैं। इनके आसपास शोर और लाइट प्रदूषण बढ़ाना न केवल इकोसिस्टम बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। उन्होंने सुझाव दिया कि फूड मार्केट केवल झीलों के डाउन स्ट्रीम क्षेत्रों में ही होने चाहिए।
मूल पहचान का संरक्षण: सामाजिक कार्यकर्ता नंद किशोर शर्मा ने भावुक होते हुए कहा कि उदयपुर की पहचान महज एक ‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ के रूप में नहीं, बल्कि यह महाराणा प्रताप, जगदीश प्रभु और आयड़ सभ्यता की नगरी है। इसे बचाने से ही पर्यटन समृद्ध होगा।
धारण क्षमता (Carrying Capacity): युवा पर्यावरणविद् कुशल रावल ने बढ़ते प्रदूषण और पहाड़ों के कटान पर चिंता जताते हुए कहा कि शहर की क्षमता से अधिक पर्यटन यहाँ की हवा और पानी को खराब कर रहा है।
स्थानीय निवासियों की समस्या और श्रमदान
वरिष्ठ नागरिक द्रुपद सिंह ने भीतरी शहर में बढ़ते वाहनों के दबाव और स्थानीय लोगों को होने वाली समस्याओं का मुद्दा उठाया। संवाद के अंत में उपस्थित सभी लोगों ने स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए स्वच्छता श्रमदान भी किया।
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