
आज विश्व कैंसर दिवस है।
यह दिन सिर्फ एक बीमारी को याद करने का नहीं,
बल्कि उन लोगों को नमन करने का है
जो मौत की आंखों में आँख डालकर
ज़िंदगी चुन लेते हैं।
आज मैं ऐसी ही एक कहानी लिख रहा हूं—
मेरे पत्रकार मित्र संजय गौतम की।
यह कहानी आंकड़ों की नहीं है,
यह कहानी हौसले, धैर्य और विश्वास की है।
करीब दो साल पहले संजय गौतम सेवानिवृत्त हुए।
रिटायरमेंट उनके लिए थम जाना नहीं था,
बल्कि एक सधी हुई दिनचर्या की शुरुआत थी।
हर सुबह चार से पाँच किलोमीटर की पैदल चाल,
नियमित जीवन,
संतुलित दिनचर्या—
वे पूरी तरह स्वस्थ थे,
ऐसे स्वस्थ कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था
कि जीवन अचानक ऐसा मोड़ ले लेगा।
फिर एक दिन…
मुंह में एक छोटा-सा छाला हुआ।
आम-सी बात।
किसे लगा था कि यही छाला
आने वाले महीनों की सबसे बड़ी परीक्षा बनेगा।
जब वह छाला ठीक नहीं हुआ,
तो डॉक्टरों की सलाह पर बायोप्सी करवाई गई।
और फिर आई वह रिपोर्ट—
जिसे पढ़ते ही
किसी के भी पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है।
कैंसर।
उस पल संजय गौतम भी टूटे।
डर, चिंता, असमंजस—
सब कुछ एक साथ उमड़ पड़ा।
उन्होंने सबसे पहले अपने परिवार को यह सच बताया।
घर में सन्नाटा छा गया।
आँखें भर आईं।
हर सवाल हवा में तैर रहा था—
अब क्या होगा?
लेकिन उसी सन्नाटे में
एक आवाज़ उठी—
हौसले की आवाज़।
संजय गौतम ने खुद को संभाला।
उन्होंने डर को खुद पर हावी नहीं होने दिया।
वरिष्ठ और अनुभवी डॉक्टरों से सलाह ली,
हर पहलू को समझा
और बहुत कम समय में
सर्जरी का साहसिक निर्णय ले लिया।
जिस दिन वे ऑपरेशन थिएटर पहुंचे,
वह दृश्य आज भी याद आता है।
वे किसी मरीज़ की तरह नहीं,
बल्कि एक आत्मविश्वासी इंसान की तरह
थिएटर में दाख़िल हुए।
हँसी थी चेहरे पर,
बातें थीं होठों पर—
मानो कह रहे हों,
“मैं लड़ने आया हूँ, हारने नहीं।”
सर्जरी सात से आठ घंटे चली।
हर मिनट परिवार के लिए
एक-एक युग के बराबर था।
जब डॉक्टर बाहर आए
और कहा—
“ऑपरेशन सफल है, सब ठीक है”—
तो आँसू राहत के बन गए।
डॉक्टरों ने बताया कि
कैंसर की कोशिकाएं
पूरी तरह निकाल दी गई हैं।
यह सुनकर
उम्मीद की एक किरण जगी।
लेकिन जब संजय गौतम को देखा गया,
तो दिल कांप उठा।
वे होश में नहीं थे।
बोलने की मनाही थी।
चेहरा पहले जैसा नहीं रहा था।
वह दृश्य
परिवार के लिए बेहद पीड़ादायक था।
फिर भी एक सुकून था—
कैंसर शरीर से बाहर था।
कुछ दिन बाद
असल संघर्ष शुरू हुआ।
जिन हिस्सों से चमड़ी ली गई थी,
वहां असहनीय दर्द,
खिंचाव और जलन
दिन-रात सताने लगी।
इसके बाद रेडिएशन शुरू हुई।
जिसने शरीर को और तोड़ दिया।
जीभ से लेकर भीतर तक
छाले ही छाले।
खाना मुश्किल।
बोलना मुश्किल।
हर पल एक परीक्षा।
ऐसे क्षण भी आए
जब मन हारने लगा।
जब लगा—
क्या यह पीड़ा कभी खत्म होगी?
लेकिन यहीं संजय गौतम ने
अपने पत्रकार मन को ज़िंदा रखा।
उन्होंने उन लोगों से मिलना शुरू किया
जिन्होंने कैंसर को हराया था।
उनकी कहानियां पढ़ीं,
अनुभव सुने,
और हर अनुभव से
नई ताक़त ली।
उन्होंने सीखा
कि दर्द से लड़ना नहीं,
उसे सहना भी एक कला है।
और उन्होंने यह कला
धीरे-धीरे सीख ली।
अप्रैल से दिसंबर तक
लगातार असहनीय पीड़ा।
लगातार संघर्ष।
और इस पूरे समय
परिवार चट्टान बनकर
उनके साथ खड़ा रहा।
आख़िरकार वह दिन आया
जब डॉक्टरों ने कहा—
कैंसर पर जीत हो चुकी है।
आज संजय गौतम स्वस्थ हैं।
वे फिर से रोज़
चार से पांच किलोमीटर पैदल चलते हैं।
ऑपरेशन के कारण
कुछ तकलीफें अभी भी हैं,
लेकिन उन महीनों की यातना के सामने
वे बहुत छोटी लगती हैं।
आज वे सिर्फ
कैंसर सर्वाइवर नहीं हैं,
बल्कि हर उस इंसान के लिए
प्रेरणा हैं
जो किसी बीमारी,
किसी डर,
या किसी अंधेरे से लड़ रहा है।
मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं
कि संजय गौतम
दीर्घायु हों,
स्वस्थ रहें,
और यूं ही अपनों के बीच
मुस्कुराते रहें।
और जो यह कहानी पढ़ रहा है—
अगर आंखें नम हो जाएँ
तो यह कमजोरी नहीं है।
और अगर हौसला जाग जाए
तो यही इस कहानी की
सबसे बड़ी जीत है।
सैयद हबीब
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