
उदयपुर। उदयपुर की ऐतिहासिक धरती पर जब सूरज ढलने लगा और झीलों के शहर की हवाओं में ठंडक घुली, तब गांधी ग्राउंड में सुरों का दीप प्रज्वलित हुआ। वेदांता उदयपुर वर्ल्ड म्यूजिक फेस्टिवल 2026 की पहली संध्या ने जैसे ही शुरुआत की, पूरा वातावरण संगीत, भावनाओं और सांस्कृतिक संवाद से गूंज उठा। यह सिर्फ एक फेस्टिवल नहीं था, बल्कि दस वर्षों की एक ऐसी संगीत-यात्रा का उत्सव था, जिसने उदयपुर को विश्व संगीत मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान दी है।
हिंदुस्तान जिंक के सहयोग से और ‘सहर’ द्वारा परिकल्पित व प्रस्तुत यह फेस्टिवल, राजस्थान सरकार एवं पर्यटन विभाग के सहयोग से आयोजित हो रहा है। पहले ही दिन उदयपुर एक बार फिर संगीत के माध्यम से वैश्विक संवाद का जीवंत मंच बन गया।
शाम की शुरुआत राजस्थानी फोक ऑर्केस्ट्रा की दमदार प्रस्तुति से हुई। ढोलक, सारंगी और लोक तालों की थाप ने जैसे राजस्थान की आत्मा को मंच पर उतार दिया। पारंपरिक धुनों ने श्रोताओं को जड़ों से जोड़ा और आने वाली संगीत-यात्रा के लिए मन को तैयार कर दिया।
इसके बाद नॉर्वे के 9 ग्रेडर नॉर्ड मंच पर आए। नॉर्वेजियन और तमिल फोक रॉक का उनका अनोखा मिश्रण श्रोताओं के लिए एक नया अनुभव था—भाषाएं भले अलग हों, पर भावनाएं एक जैसी।
अल्जीरिया से आए सोफियान सैदी ने अपनी भावपूर्ण और ऊर्जा से भरी प्रस्तुति से माहौल को और गहरा कर दिया। उनकी आवाज़ में छिपे वैश्विक सुरों ने उद्घाटन संध्या को अविस्मरणीय बना दिया।
जब कैलाश खेर के स्वरों में उतरे शिव
शाम की सबसे प्रतीक्षित घड़ी तब आई, जब मंच पर कैलाश खेर और कैलासा लाइव का आगमन हुआ। जैसे ही उनके स्वर गूंजे, गांधी ग्राउंड भक्ति, प्रेम और संगीत की तीव्रता में डूब गया।
“कैसे बताएं क्यों तुझको चाहें…”,
“मैं तो तेरे प्यार में दीवाना हो गया…”
और “ओ पिया…”—
हर गीत पर दर्शक झूम उठे, तालियों की गूंज आसमान तक जा पहुंची।
कैलाश खेर की शिव स्तुति और भावनात्मक गायकी ने ऐसा अनुभव रचा, मानो शिव स्वयं संगीत के रूप में मंच पर विराजमान हों। वह क्षण शब्दों से परे, सिर्फ अनुभूति का था—जहां संगीत ही साधना बन गया।
भावनाओं में बंधे विचार : हिंदुस्तान जिंक के सीईओ अरुण मिश्रा ने कहा कि संगीत और संस्कृति अलग-अलग आवाज़ों को एक सुर में पिरोने की अद्भुत शक्ति रखते हैं। राजस्थानी लोक और वैश्विक सुरों का यह संगम उसी का प्रमाण है।
वहीं ‘सहर’ के फाउंडर संजीव भार्गव ने कहा कि फेस्टिवल का पहला दिन आने वाले दिनों की लय तय करता है, और यह दिन सच्चे सांस्कृतिक संवाद और साझा भावनाओं की खूबसूरत मिसाल बन गया।
आगे भी बहेंगे सुर…: पहले दिन की इस शानदार शुरुआत के बाद, फेस्टिवल के अगले दिन मांझी घाट पर सुबह की ध्यानमग्न धुनें, फतहसागर पाल पर दोपहर का रोमांटिक संगीत और गांधी ग्राउंड पर शाम की दमदार प्रस्तुतियां श्रोताओं का इंतज़ार कर रही हैं।
उदयपुर की यह संगीत संध्या यह कह गई—जब सुर मिलते हैं, तो सीमाएं टूट जाती हैं… और संगीत, दिलों की साझा भाषा बन जाता है।
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