भिवाड़ी की वो काली सुबह : जहां धुएं के गुबार में दफन हो गईं सात परिवारों की खुशियां, कंकाल बने अपनों को थैलियों में बटोरता दिखा प्रशासन

भिवाड़ी। सोमवार सुबह जब सूरज की पहली किरण ने भिवाड़ी की औद्योगिक धरा को छुआ होगा, तब खुशखेड़ा के एक कारखाने में काम करने वाले उन 25 मजदूरों ने सोचा भी नहीं था कि आज की दिहाड़ी उनकी जिंदगी की आखिरी कमाई साबित होगी। सुबह के साढ़े नौ बजे थे, हवाओं में काम की सरगर्मी थी, लेकिन एक जोरदार धमाके ने अचानक सब कुछ राख में तब्दील कर दिया।

लाशें नहीं, बस अवशेष बचे…

हादसे का मंजर इतना खौफनाक था कि पत्थर दिल इंसान की भी रूह कांप जाए। आग की लपटें जब शांत हुईं, तो पीछे कोई इंसान नहीं बचा था, बस हड्डियों के कुछ जले हुए ढांचे और मांस के लोथड़े बिखरे पड़े थे। प्रशासन और रेस्क्यू टीम के लिए यह महज एक ‘ऑपरेशन’ नहीं था, बल्कि एक ऐसी बेबसी थी जहाँ उन्हें इंसानी वजूद के टुकड़ों को पॉलीथीन की थैलियों में सहेजना पड़ रहा था। जिस हाथ ने सुबह अपनों को अलविदा कहा होगा, उसी हाथ की उंगलियां राख के ढेर में तलाशी जा रही थीं।

लालच की भेंट चढ़ी मासूम जिंदगियां

फैक्ट्री की उन चारदीवारों के भीतर मौत का सामान ‘अवैध पटाखे’ के रूप में तैयार हो रहा था। चंद रुपयों के मुनाफे के लिए सुरक्षा के सारे नियमों को बारूद के ढेर पर रख दिया गया। मौके पर बिखरे पटाखों के डिब्बे और बारूद की गंध चीख-चीख कर कह रही थी कि यह सिर्फ हादसा नहीं, बल्कि उन मजदूरों की ‘हत्या’ है जो पेट पालने की खातिर इस जानलेवा खतरे से अनजान वहां काम कर रहे थे।

अधूरे रह गए सपने, अब बस सन्नाटा है

हादसे में सात मजदूर जिंदा जल गए। उनके पीछे अब सिर्फ उन परिवारों का विलाप बचा है, जो शाम को उनके घर लौटने का इंतजार कर रहे थे। 4 मजदूर जिंदगी और मौत के बीच दिल्ली एम्स के गलियारों में जूझ रहे हैं। फैक्ट्री मालिक और लीज पर लेने वाला शख्स फरार हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी गिरफ्तारी उन बच्चों के सिर पर फिर से पिता का साया ला पाएगी? या उस मां की गोद भर पाएगी जिसका बेटा कोयला बन गया?

प्रशासन की बेबसी और खामोश सवाल

कलेक्टर और एडीएम मौके पर हैं, जांच की बातें हो रही हैं, कार्रवाई का आश्वासन दिया जा रहा है। लेकिन राख के ढेर में तब्दील हो चुकी उस फैक्ट्री के बाहर फैला सन्नाटा एक बड़ा सवाल पूछ रहा है— “क्या गरीब की जान इतनी सस्ती है कि उसे बारूद के डिब्बों में पैक कर दिया जाए?”

दुखद पहलू :

जो हाथ कल तक मेहनत की लकीरें खींच रहे थे, आज उन्हें पॉलीथीन में समेटकर अस्पताल ले जाया गया। भिवाड़ी की इस आग ने सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि इंसानियत के भरोसे को भी जलाकर राख कर दिया है।

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