
सैयद हबीब, उदयपुर
कहते हैं कि थियेटर की दुनिया में ‘एग्जिट’ (प्रस्थान) उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि ‘एंट्रेंस’ (प्रवेश)। लेकिन जीवन के रंगमंच पर कुछ किरदार ऐसे शालीन होते हैं कि उनके जाने के बाद भी उनकी खामोशी एक मुकम्मल संवाद की तरह गूंजती रहती है। डॉ. मधुसूदन शर्मा का जाना शिक्षा और सियासत के उस दुर्लभ पुल का टूट जाना है, जिसे उन्होंने बड़ी नफासत से बनाया था।
वे जीव विज्ञान के प्रोफेसर थे, जीवन के उस शास्त्र के ज्ञाता जहाँ कोशिकाएं (Cells) मिलकर जीवन बुनती हैं। मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी के गलियारों से लेकर कोटा यूनिवर्सिटी के कुलपति के पद तक, उन्होंने सत्ता को कभी ओढ़ा नहीं, बल्कि उसे एक शिक्षक की गरिमा से संवारा। अमूमन शिक्षा और राजनीति दो अलग ध्रुव माने जाते हैं—एक विचार की दुनिया है, दूसरी जोड़-तोड़ की। डॉ. शर्मा ने इन दोनों के बीच एक ऐसा ‘मिडल पाथ’ (मध्य मार्ग) चुना, जैसा किसी क्लासिक फिल्म का नायक चुनता है जो शोर के बीच भी अपनी लय नहीं खोता।
सियासत की बिसात पर वे कांग्रेस के जिलाध्यक्ष रहे, लेकिन उनका अंदाज़ा किसी मंझे हुए ‘सूफी’ जैसा था। राजनीति आज के दौर में ‘लाउड’ (शोरगुल वाली) हो गई है, जहां जो जितना चिल्लाता है, उतना बड़ा नेता माना जाता है। मगर डॉ. शर्मा ने धैर्य का वह दामन थामे रखा जिसे आज की पीढ़ी शायद भूल चुकी है। किस्सा मशहूर है कि कई बार लोगों ने आवेश में आकर उनसे बदसलूकी की, कड़वे शब्द कहे, लेकिन डॉ. साहेब ने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया। उनकी यह चुप्पी हार नहीं थी, बल्कि सामने वाले के ज़मीर को जगाने का एक मौन आमंत्रण थी। अक्सर बाद में वही लोग ग्लानि में उनसे माफी मांगते पाए गए। यह दृश्य किसी ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म जैसा लगता है, जहां सौम्यता ही सबसे बड़ा हथियार बन जाती है।
शहर की समस्याओं को उठाने का उनका अंदाज़ भी निराला था—बिना किसी हंगामे के, बिना किसी तख्ती के। उनके समर्थक कभी-कभी उनकी इस अति-शांति से झुंझला जाते थे, पर वे मुस्कुराकर उन्हें समझा लेते थे। उन्होंने कांग्रेस में ‘अंतिम पंक्ति’ के व्यक्ति को आगे लाने का जो काम किया, वह बताता है कि वे केवल नेता नहीं, बल्कि एक ‘मेंटर’ (मार्गदर्शक) थे।
पिछले दो साल से वे अपनी ही देह की कोशिकाओं से, किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे। नियति का यह ‘क्लाइमेक्स’ अप्रत्याशित और दुखद है। डॉ. मधुसूदन शर्मा का जाना एक ऐसे दौर का अंत है जहाँ विनम्रता को कमज़ोरी नहीं, बल्कि संस्कार माना जाता था। वे चले गए हैं, लेकिन अपनी पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं जो हमें याद दिलाती रहेगी कि राजनीति में भी ‘प्रोफेसर’ होना मुमकिन है—बशर्ते आपके भीतर का मनुष्य जीवित रहे।
अलविदा डॉक्टर साहेब! पर्दे के पीछे अब आपकी यादों की रील ही बाकी है।
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