
मुगल सत्ता के केंद्र से लेकर 1857 के गदर और आजाद भारत के लोकतांत्रिक संकल्प तक; क्यों खास है लाल किले की प्राचीर
नई दिल्ली। हर वर्ष 15 अगस्त को देश स्वतंत्रता दिवस के उल्लास में डूब जाता है। इस राष्ट्रीय पर्व का सबसे भव्य और ऐतिहासिक दृश्य देश की राजधानी स्थित लाल किले से सामने आता है, जहां देश के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं और प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हैं। लेकिन आजादी के इस सबसे बड़े उत्सव के लिए लाल किले को ही क्यों चुना गया? इसका उत्तर भारत के सदियों पुराने इतिहास, सत्ता के हस्तांतरण और राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीकों में समाहित है।
1. सत्ता का केंद्र और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी
लाल किले का निर्माण 17वीं सदी में मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी नई राजधानी शाहजहानाबाद के केंद्र के रूप में करवाया था (1639–1648)। यमुना किनारे लाल बलुआ पत्थर से बना यह किला सदियों तक हिंदुस्तान की राजनीतिक शक्ति का मुख्य केंद्र रहा।
1857 की क्रांति: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों ने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को क्रांति का प्रतीकात्मक नेतृत्व सौंपा था। विद्रोह के दमन के बाद अंग्रेजों ने लाल किले पर सैन्य नियंत्रण स्थापित कर लिया।
ब्रिटिश हुकूमत का प्रतीक: अंग्रेजों ने किले की संरचनाओं में सैन्य जरूरत के अनुसार बदलाव किए और यह किला ब्रिटिश सत्ता व दमन का भी केंद्र बन गया।
2. साम्राज्य से लोकतंत्र की ओर सत्ता का शक्तिशाली संदेश
जब भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ, तब देश को एक ऐसे राष्ट्रीय प्रतीक की आवश्यकता थी जो सदियों की गुलामी के अंत और स्वतंत्र गणराज्य की संप्रभुता को दर्शा सके:
लोकतंत्र की विजय का प्रतीक: जिस इमारत की प्राचीर से कभी सम्राट और औपनिवेशिक शासक अपनी ताकत दिखाते थे, उसी प्राचीर से लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री द्वारा तिरंगा फहराना यह संदेश देता है कि अब देश की संप्रभुता किसी साम्राज्य के अधीन नहीं, बल्कि भारत की 140 करोड़ जनता के हाथों में है।
3. पहली बार 15 नहीं, 16 अगस्त 1947 को फहराया गया था तिरंगा
प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार:
16 अगस्त 1947 की शुरुआत: भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पहली बार लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज 16 अगस्त 1947 को सुबह फहराया था।
मजबूत परंपरा का रूप: शुरुआती दिनों में लाल किले से जुड़ा यह आयोजन धीरे-धीरे 15 अगस्त के मुख्य राष्ट्रीय समारोह और एक अटूट लोकतांत्रिक परंपरा में तब्दील हो गया।
4. राष्ट्र के नाम संदेश और यूनेस्को विश्व धरोहर
नागरिकों से सीधा संवाद: लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का संबोधन केवल सरकारी रस्म नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र से सीधा संवाद होता है, जिसमें देश की उपलब्धियों, चुनौतियों और भावी विकास की रूपरेखा रखी जाती है।
वैश्विक धरोहर: भारतीय स्थापत्य और इतिहास के अनूठे संगम के कारण लाल किला परिसर को वर्ष 2007 में यूनेस्को की विश्व धरोहर (UNESCO World Heritage Site) सूची में शामिल किया गया था।
हर 15 अगस्त को लाल किले पर फहराने वाला तिरंगा केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों, औपनिवेशिक दासता से मुक्ति और एक स्वाभिमानी लोकतांत्रिक भारत की पहचान का जीवंत प्रतीक है।
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