उदयसागर की छाती पर पांच साल का शाही अट्टहास

सैयद हबीब, उदयपुर

हमारे देश में जब पाप पांच साल पुराना हो जाता है, तो उसे ‘विकास’ और ‘संस्कृति’ की चाशनी में डुबोकर ‘सिल्वर’ या ‘वुडन जुबली’ का नाम दे दिया जाता है। अपराध जब नया-नया होता है, तो कायदे-कानून की फाइलों में चंद तारीखें पड़ती हैं; पर जब वह पांच बरस का हो जाए, तो बाकायदा शहनाई बजती है, बोट पर बैठकर अफसर और दरबारी ताली बजाते हैं और उसे ‘मील का पत्थर’ घोषित कर दिया जाता है।

झीलों की नगरी कहलाने वाले उदयपुर के उदयसागर में भी यही हुआ। सदियों से पानी सहेजने वाली झील की छाती पर नियमों की धज्जियां उड़ाकर, कानून के फेफड़े निचोड़कर जो कंक्रीट का महल—रैफल्स होटल—खड़ा किया गया था, उसने बड़े गर्व से अपनी पांचवीं वर्षगांठ मनाई है। प्रेस नोट बता रहा है कि वे अपने कर्मचारियों को ‘हार्टिस्ट’ कहते हैं और उन्होंने एक दिन के लिए उन्हें ‘मेहमान’ बनाकर झील में बोट की सैर कराई, पलाडियन गेट पर घंटा बजाया और ‘द राइटर्स बार’ में बैठकर कॉकटेल की चुस्कियों के साथ यादें ताजा कीं।

कितना मार्मिक और आंसू निकाल देने वाला दृश्य है! जिन हाथों ने पांच साल तक रसूखदारों को पानी परोसने में अपनी रीढ़ झुकाई, मालिक ने उन्हें एक दिन उसी पानी पर तैरती नाव में बिठाकर समझा दिया कि देखो, हमने तुम्हें इंसान मान लिया है। पूंजीवाद जब अपनी क्रूरता को छुपाने के लिए भावुकता का लबादा ओढ़ता है, तो ऐसे ही ‘हार्टिस्ट’ पैदा होते हैं।

मगर इस सजे-धजे तमाशे के ठीक पीछे, उदयसागर के किनारे सूखे कंठ लिए वह अवाम खड़ी है, जिसके जले पर यह जश्न नमक की तरह छिड़का जा रहा है।

उदयपुर में एक मौसम बादल रूठ जाएं, तो नलों में हवा सरसराने लगती है। मोहल्लों में दो-दो बाल्टी पानी के लिए माथाफोड़ी हो जाती है और नगर परिषद के टैंकरों के पीछे लोग ऐसे भागते हैं जैसे मोक्ष की तलाश में हों। लेकिन इसी शहर के पानी को बंधक बनाकर, उसके समूचे इको-सिस्टम और जलीय जीवन की कब्र खोदकर खड़ी की गई विलासिता की यह मीनार चौबीसों घंटे पानी के फव्वारे उड़ाती है। झील का पेट काटकर बनाए गए 137 कमरों और प्राइवेट पूलों में तैरने वालों के लिए पानी की कोई कमी नहीं है; कमी तो बस उस आम नागरिक के नसीब में है, जो कानून की किताबों में ‘लोकतंत्र का मालिक’ कहलाता है।

कायदे-कानून का हमारे मुल्क में बड़ा अदब है। पर्यावरण के नियम इतने लचीले बनाए जाते हैं कि अगर कोई गरीब अपनी झोपड़ी की मुंडेर पर दो ईंटें ज्यादा रख ले, तो यूआईटी का बुलडोजर अगले ही पहर सायरन बजाता हुआ पहुंच जाता है। मगर जब कोई विदेशी ब्रांड पूरी की पूरी झील के द्वीप पर कब्जा करके कंक्रीट का जंगल उगा दे, तो पर्यावरण संरक्षण बोर्ड के दफ्तरों में अचानक मोतियाबिंद फैल जाता है। फाइलें इतनी चिकनी हो जाती हैं कि उन पर आपत्तियों के पैर फिसल जाते हैं।

होटल के जनरल मैनेजर कह रहे हैं कि ‘पांच साल का सफर उन यादों और अनुभवों का प्रतीक है जो साझा किए गए।’ वे सच ही तो कह रहे हैं। यह सफर इस बात की याद दिलाता है कि कैसे सांठगांठ के जरिए प्रकृति की गर्दन मरोड़ी जा सकती है। यह उस अनुभव का जश्न है कि अगर आपकी जेब में अंधा पैसा और रसूख है, तो आप एक ऐतिहासिक झील के अस्तित्व को लीलकर भी पांच साल तक बेखौफ हंस सकते हैं।

कहा जा रहा है कि इस नुकसान की भरपाई सौ साल के जश्न में भी नहीं हो सकती। मगर विडंबना देखिए, सौ साल बाद जब यह झील शायद एक सूखा गढ्ढा बनकर रह जाएगी, तब भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज होगा कि जब शहर प्यास से तड़प रहा था, तब उदयसागर के टापू पर ‘द राइटर्स बार’ में शराब के जाम टकरा रहे थे और जिम्मेदार हुक्मरान अपनी बहरी आंखों से उस कत्ल का तमाशा देखकर मुस्करा रहे थे।

 

About Author

Leave a Reply