34 हज़ार फीट पर भारतीय संस्कार और शौर्य : जब कैप्टन स्मित के अदम्य साहस के आगे नतमस्तक हुई दुनिया

सैयद हबीब, नई दिल्ली।

भारतीय मानस की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि वह घोर से घोर संकट और अंधकार के बीच भी अपना संतुलन और नैतिक विवेक नहीं खोता। हम अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि आधुनिकता और तकनीक की अंधी दौड़ में क्या भारत का वह पारंपरिक कर्तव्यबोध और आत्मोत्सर्ग का भाव कहीं पीछे छूट गया है? फ्लाईदुबई के विमान में 34 हज़ार फीट की बुलंदी पर जो कुछ घटा, उसने पूरी दुनिया को यह साफ संदेश दे दिया कि जब इम्तिहान की घड़ी आती है, तो एक भारतीय का आचरण किसी भी संकट से बड़ा साबित होता है।

कॉकपिट के भीतर सह-पायलट का अचानक खूंखार हो जाना और चाकू से हमला कर विमान को पाताल की ओर धकेल देना, उस विकृत मानसिकता का परिचायक था जो इंसानियत को तबाह करने पर तुली थी। लेकिन उस खूनी मंजर के सामने खड़े थे भारत के सपूत कैप्टन स्मित मछार।

सोचिए, देह पर चाकू के गहरे घाव, रिसता हुआ खून, 34 हज़ार फीट से तेजी से नीचे गिरता बोइंग विमान और मौत की ओर बढ़ते 174 मुसाफिर। ऐसे पलों में कोई भी इंसान घुटने टेक सकता था, लेकिन स्मित के भीतर वह भारतीय जीवट जागा जिसने अपनी देह की पीड़ा को कर्तव्य के आगे बौना साबित कर दिया। उन्होंने न केवल उस हमलावर से सीधा लोहा लिया, बल्कि असीम मानसिक संतुलन दिखाते हुए कॉकपिट का वह दरवाजा खोलने में कामयाबी पाई, जो आम तौर पर अभेद्य माना जाता है।

यह उस भारतीय चेतना का प्रकटीकरण था जो ‘परहित’ को अपने प्राणों से ऊपर रखती है। भारत की मिट्टी ने हमेशा यह सिखाया है कि संकट में धैर्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ा जाता। स्मित ने वही किया। उनके इस हौसले ने केबिन में बैठे अन्य मुसाफिरों को संभलने और हमलावर पर काबू पाने का अवसर दिया, जिसके बाद विमान को सुरक्षित उतारा जा सका।

आज जब इजरायल के प्रधानमंत्री से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति तक एक स्वर में भारतीय कैप्टन के शौर्य को सलाम कर रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्होंने दूसरे 9/11 को टाल दिया, तो यह केवल एक व्यक्ति की प्रशंसा नहीं है। यह दुनिया के फलक पर उस भारतीय पेशेवर दक्षता, आत्मसंयम और जांबाजी की गूंज है, जो विकट से विकट परिस्थितियों में भी मानवता की रक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ी हो जाती है।

कैप्टन स्मित मछार ने अपने सीने पर घाव सहकर यह साबित किया कि भारत जब भी संकट के किसी चौराहे पर खड़ा होता है, वह अपनी मेधा, अपने त्याग और अपने अदम्य साहस से विनाश के जबड़े से भी जीवन को खींच लाने का माद्दा रखता है।

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