
उदयपुर। राजस्थान भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के हत्थे चढ़े स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) के एएसपी मुकेश सोनी का भ्रष्टाचार प्रकरण अब एक फिल्मी थ्रिलर बनता जा रहा है। दो करोड़ के रिश्वतकांड में लिप्त इस खाकीधारी अधिकारी को लेकर हर रोज चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। एसीबी सूत्रों का दावा है कि एएसपी मुकेश सोनी खुद जांच एजेंसी के तौर-तरीकों से वाकिफ होने के कारण एसीबी की ही जासूसी कर रहा था और परिवादी की हर गतिविधि पर नजर रखे हुए था।
एसीबी को था शक, इसलिए चली खास चाल
एसीबी सूत्रों के अनुसार, आरोपी एएसपी मुकेश सोनी को इस बात की पूरी भनक लग चुकी थी कि एसीबी उस तक पहुंच सकती है। वह एसीबी चौकी के लगभग हर अधिकारी और कर्मचारी के काम करने के तरीके और उनके चेहरों से अच्छी तरह वाकिफ था।
परिवादी निरंजन मोगरा ने जब एसीबी को बताया कि एएसपी उस पर लगातार नजर रख रहा है, तो जांच एजेंसी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया। परिवादी को एसीबी ऑफिस आने से रोक दिया गया और उसे आश्वस्त किया गया कि अधिकारी खुद उससे संपर्क करेंगे। इस हाई-प्रोफाइल ट्रैप को अंजाम देने के लिए एसीबी ने एक प्रशासनिक अधिकारी को अपनी योजना में शामिल किया, जिनके माध्यम से शिकायत का सत्यापन (वेरिफ़िकेशन) कराया गया। चौकी के किसी भी कर्मचारी को शुरुआती ऑपरेशन में शामिल नहीं किया गया और जब पूरी पुख्ता जानकारी मिल गई, तब दलाल सज्जन सिंह जैन को 1.96 करोड़ रुपए के साथ रंगे हाथों दबोच लिया गया।
आईफोन के पासवर्ड पर अटकी जांच, 5 दिन से चुप्पी
गिरफ्तारी के बाद से ही एएसपी मुकेश सोनी जांच में किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं कर रहा है। एसीबी के अधिकारी पिछले 5 दिनों से उसके महंगे आईफोन को अनलॉक करने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन आरोपी अधिकारी ने उसका पासवर्ड बताने से साफ इंकार कर दिया है। जांच एजेंसियों को अंदेशा है कि इस फोन में इस पूरे महाघूसकांड और कई अन्य काले कारनामों के राज दबे हुए हैं।
इसके अलावा, जब एसीबी ने उसे पूछताछ के दौरान रिश्वत मांगने से जुड़ी ऑडियो रिकॉर्डिंग सुनाई, तो वह पूरी तरह चुप हो गया। वहीं, दलाल सज्जन सिंह ने स्वीकार किया है कि उसने एएसपी के कहने पर ही परिवादी से संपर्क किया था। हालांकि, परिवादी के घर से डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर (DVR) क्यों जब्त किया गया और खाली चेक पर साइन क्यों कराए गए, इन सवालों पर एएसपी अब भी खामोश है। बुधवार को दोनों आरोपियों को कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उनकी रिमांड 3 अक्टूबर तक बढ़ा दी गई है।
क्या है पूरा प्लॉट घोटाला?
यह पूरा मामला साल 2012 का है, जब यूआईटी (UIT) ने कई कॉलोनियां निगम को ट्रांसफर की थीं और करोड़ों के खाली प्लॉट बचे थे। आरोप है कि भू-माफियाओं और निगम के भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों ने मिलीभगत कर इन जमीनों के फर्जी दस्तावेज और लीज डीड तैयार करवा लिए। फर्जी व्यक्तियों के नाम नामांतरण खोलकर इन्हें आगे महंगे दामों में बेच दिया गया।
इसी मामले में सूरजपोल थाने में 2022 में एफआईआर दर्ज हुई थी। एसओजी ने इस मामले में पूर्व जिला अल्पसंख्यक अधिकारी हेमलता कांकरिया और उनके पति निरंजन मोगरा को गिरफ्तार किया था, जिनके घर से 2 किलो सोने के जेवर और 11 लाख रुपए नकद जब्त किए गए थे। इसी मामले में एफआर (Final Report) लगाने और जब्त किया गया कीमती सामान छोड़ने की एवज में इस भारी-भरकम रिश्वत की डिमांड की गई थी।
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