
नई दिल्ली। ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ’ पर आधारित फिल्म में शबाना आज़मी और सनी देओल; विभाजन के 79 साल बाद भी नई पीढ़ी के ज़हन में ताज़ा हैं जख्म
सिनेमा/साहित्य विश्लेषण: “अम्मा, अगर हम लोग और माई एक ही घर में रह सकते हैं तो हिंदुस्तान में हिंदू और मुसलमान साथ क्यों नहीं रह सकते थे?” यह सवाल केवल 10-11 साल की बच्ची तन्नो का नहीं, बल्कि 1947 के विभाजन की उस पूरी विभीषिका पर एक करारा तमाचा है, जिसने करोड़ों इंसानों को अपनी जड़ों से उखाड़ फेंका।
असग़र वजाहत के प्रसिद्ध नाटक ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ’ पर आधारित फिल्म ‘बंटवारा 1947’ (निर्देशक: राजकुमार संतोषी, आमिर खान प्रोडक्शन) ने एक बार फिर विभाजन की उस त्रासदी को केंद्र में ला खड़ा किया है, जिसका सबसे भयावह दंश महिलाओं ने झेला था।
लखनऊ से लाहौर: हकीकत पर आधारित ‘माई’ का किरदार
नाटक और फिल्म की कहानी विभाजन के बाद लखनऊ से उजड़कर लाहौर पहुंचे मिर्ज़ा परिवार (फिल्म में सनी देओल और प्रीति ज़िंटा) और उस आलीशान हवेली की मूल मालकिन—एक बूढ़ी हिंदू औरत ‘माई’ (शबाना आज़मी) के इर्द-गिर्द घूमती है।
हकीकत से उपजा पात्र: लेखक असग़र वजाहत के अनुसार, यह किरदार कोई कोरी कल्पना नहीं था। उनके मित्र और उर्दू पत्रकार संतोष कुमार जब बंटवारे के बाद लाहौर लौटे, तो उन्होंने अपनी संस्मरणों में इस निडर बूढ़ी औरत का जिक्र किया था, जिसने अपना परिवार खोने के बावजूद मुस्लिम बहुल मोहल्ले में अपनी हवेली और लाहौर छोड़ने से साफ इनकार कर दिया था।
विवाद और प्रतिबंध: 1990 के दशक में जब हबीब तनवीर ने भारत में इसका मंचन किया, तो पाकिस्तान के कराची में इस नाटक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। तत्कालीन पुलिस अधिकारियों को इस बात पर आपत्ति थी कि नाटक में एक मौलवी हिंदू महिला का सम्मान करता है और उसकी मृत्यु के बाद हिंदू रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार कराने की पैरवी करता है।
इतिहास का स्याह पन्ना: ‘अनअटैच्ड वूमेन’ (Unattached Women)
विभाजन के दौरान महिलाओं के साथ हुई बर्बरता को तत्कालीन राहत एवं पुनर्वास मंत्रालय (Ministry of Relief and Rehabilitation) ने एक प्रशासनिक श्रेणी दी थी—’अनअटैच्ड वूमेन’।
अपनों से ठुकराई गईं औरतें: वे महिलाएं जिनका अपहरण कर लिया गया, और जब उन्हें बरामद किया गया तो परिवारों ने ‘पवित्रता’ के नाम पर उन्हें अपनाने से मना कर दिया।
बिना पुरुष संरक्षण वाली महिलाएं: विधवाएं, तलाकशुदा, अविवाहित युवतियां और सेक्स वर्कर्स, जिनका कोई औपचारिक पुरुष संरक्षक नहीं बचा था।
साहित्य में गूंज: यह दर्द इस्मत चुग़ताई की कहानी ‘जड़ें’ की उस अम्मा में दिखता है जो पेड़ की जड़ों की तरह हवेली से चिपकी रहीं, और राजिंदर सिंह बेदी की अमर कृति ‘लाजवंती’ में, जहां अगवा होकर लौटी पत्नी को पति ‘देवी’ का दर्जा तो देता है, लेकिन दिल से स्वीकार नहीं कर पाता।
नाटक के सिकंदर मिर्ज़ा बनाम सिनेमा के सनी देओल
मूल नाटक और कमर्शियल सिनेमा के ट्रीटमेंट में एक बड़ा अंतर नायक के चरित्र चित्रण में देखने को मिलता है:
नाटक की जटिलता: नाटक का सिकंदर मिर्ज़ा एक आम, भयभीत और स्वार्थी इंसान है, जो शुरुआत में माई को हवेली से बेदखल करने या मरवाने के लिए स्थानीय गुंडों से संपर्क तक करता है, लेकिन धीरे-धीरे मानवीय संवेदना और अपनापन नफरत पर भारी पड़ता है।
सिनेमाई रूपांतरण: फिल्म में सनी देओल के किरदार को अधिक साहसी और नफरत के खिलाफ सीधे टकराने वाले ‘लार्जर-दैन-लाइफ’ नायक के रूप में पेश किया गया है, जो कहता है—”मां को हिंदू-मुसलमान में न बांटिए, मां अपने आप में एक मज़हब है।”
विभाजन और युवा पीढ़ी का ‘इंटरजेनरेशनल ट्रॉमा’
विभाजन के 79 वर्ष बीत जाने के बाद भी नई पीढ़ी इस ऐतिहासिक त्रासदी को भूल नहीं पाई है:
पीढ़ी-दर-पीढ़ी का दर्द: शरणार्थी परिवारों की युवा पीढ़ी बताती है कि कैसे पाकिस्तान से भारत आते वक्त परिवारों ने अपनी बेटियों की अस्मत बचाने के लिए खौफनाक कदम उठाए थे और कैसे भारत आकर पहचान का संकट झेला।
अमृतसर का पार्टिशन म्यूजियम: युवाओं का मानना है कि विभाजन के दौरान
महिलाओं के साथ हुए सामूहिक अपराधों, अपहरण और विस्थापन की सच्ची कहानियों को फिल्मों और इतिहास के जरिए सामने लाया जाना बेहद जरूरी है, ताकि समाज नफरत के दौर से बाहर निकल सके।
फिल्म ‘बंटवारा 1947’ और वजाहत का नाटक अंततः इसी बात को स्थापित करते हैं कि सरहदें खिंच जाने और मजहबी उन्माद के बावजूद इंसानियत और ममता की जड़ें कभी खत्म नहीं होतीं।
स्रोत : बीबीसी हिंदी
About Author
You may also like
स्वतंत्रता दिवस 2026 : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 78 वीरता पुरस्कार और 89 विशेष उल्लेख को दी मंजूरी
80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर रोशनी से जगमगाई दिल्ली विधानसभा: स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने दी शुभकामनाएं
उदयपुर : सहेलियों के संग सावन की रंगत, फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत के कैमरे से देखिए हरियाली अमावस्या मेले के मनमोहक रंग
फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत के लेंस से हरियाली अमावस के रंग: फतहसागर की पाल पर बिखरी लोक-संस्कृति, देखिए कैमरे में कैद खूबसूरत नजारे
राजस्थान में 183 RAS अधिकारियों के तबादले : आगामी निकाय व पंचायत चुनावों से पहले सरकार की प्रशासनिक फील्डिंग
