लाचारी के वार्ड, नदारद जनसेवक और पंजाब के राजभवन से आती संवेदनशील आहट

उदयपुर। लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि अस्पताल बदहाल हैं, दवाइयां गायब हैं या स्ट्रेचर पर पड़े मरीज कराह रहे हैं। त्रासदी यह है कि जनता के वोटों से चुनकर विधानसभा और संसद में बैठने वाले रहनुमाओं ने अपनी आंखों पर ‘सब चंगा सी’ की ऐसी पट्टी बांध ली है कि उन्हें अपने ही शहर की सिसकियां सुनाई नहीं देतीं।

ताजा नजीर चंडीगढ़ से आई है। पंजाब के राज्यपाल (और कभी मेवाड़ की राजनीति की धुरी रहे गुलाबचंद कटारिया) ने जीएमसीएच-32 (GMCH-32) पहुंचकर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं, विकास परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे की सीधी पड़ताल की। वे सिर्फ औपचारिकता निभाने नहीं गए; उन्होंने डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और सफाई कर्मियों से सीधे बात की, उनकी दिक्कतें समझीं और प्रशासन की ओर से मौके पर समाधान का भरोसा दिया।

यह कोई अचानक उपजा शौक नहीं है। उदयपुर के लोग जानते हैं कि कोरोना का वह भयावह दौर रहा हो या उससे पहले के सामान्य दिन, कटारिया साहब का एमबी (महाराणा भूपाल) अस्पताल का वह नियमित दौरा महज एक राजनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि जनता के प्रति एक अभिभावक जैसी जवाबदेही का हिस्सा हुआ करता था। कहां वेंटिलेटर बंद पड़ा है, कहां जांच मशीन धूल फांक रही है, कहां मरीज जमीन पर पड़े हैं—वे न सिर्फ अफसरों की क्लास लेते थे, बल्कि अपने रसूख से उसका हल भी निकालते थे। पुराने रिकॉर्ड खंगालेंगे तो पता चल जाएगा कि कटारियाजी अस्पताल के कितने दौरे करते थे और आज के जनप्रतिनिधि कितने दौरे कर रहे हैं?

लेकिन आज लेकसिटी के राजनीतिक फलक पर नजर दौड़ाइए। सत्ता के सिंहासन पर बैठे मौजूदा जनप्रतिनिधियों की चुप्पी इतनी गहरी है कि वह किसी बहरेपन का भ्रम पैदा करती है।

संभाग के सबसे बड़े एमबी अस्पताल के गलियारों में जाकर देखिए—दवा काउंटर पर लगी लंबी-लंबी कतारें, सोनोग्राफी और एमआरआई की तारीखों के लिए हफ्तों का इंतजार, ट्रॉमा सेंटर में बदहवास तीमारदार और स्ट्रेचर खींचते असहाय परिजन। सेटेलाइट अस्पतालों और शहर की डिस्पेंसरियों का हाल तो ऐसा है कि वे खुद प्राथमिक उपचार की मोहताज दिखती हैं। डॉक्टरों की कमी, संसाधनों की बदहाली और दवाइयों का टोटा आम बात हो चुकी है।

मगर मजाल है कि हमारे आज के विधायकों, सांसदों या स्थानीय मठाधीशों को इन बदहाल दरवाजों पर दस्तक देने की फुर्सत मिली हो! उनके सरकारी दौरों और सोशल मीडिया की चमचमाती तस्वीरों में फीता काटने के उत्सव तो दिखते हैं, लेकिन अस्पताल के किसी जनरल वार्ड में जाकर किसी गरीब के सिर पर हाथ रखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। माननीयों के ख्याली पुलाव में तो उदयपुर की स्वास्थ्य सेवाएं इतनी चाक-चौबंद हैं कि जैसे यहां लंदन या स्विट्जरलैंड का कोई अस्पताल चल रहा हो।

जब कोई नेता सिर्फ जीत जाने के बाद जनता को उसकी लाचारी और कतारों के हवाले छोड़ दे, तो यह मान लेना चाहिए कि व्यवस्था में सिर्फ संवेदनशीलता ही नहीं मरी है, बल्कि जनप्रतिनिधित्व का नैतिक अधिकार भी समाप्त हो चुका है।

चंडीगढ़ के अस्पताल में खड़े होकर व्यवस्था को दुरुस्त करने का संकल्प दोहराते एक पूर्व जनप्रतिनिधि की तस्वीर दरअसल उदयपुर के मौजूदा सियासी सूरमाओं के चेहरे पर एक तीखा तमाचा है। यह तस्वीर याद दिलाती है कि जनसेवा भाषणों, आश्वासनों और चुनावी बैनरों से नहीं, जनता के दुख-दर्द में सीधे ज़मीन पर उतरकर साझेदार बनने से साबित होती है।

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