लोकतंत्र का सबसे बड़ा तमाशा: जब संसद से चुनाव आयोग तक गूंजा ‘वोट चोर’ का नारा और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग!

नई दिल्ली। इस दृश्य की कल्पना तो कीजिए—300 से ज्यादा सांसद, जो इस देश के करोड़ों मतदाताओं के प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं, वे सड़कों पर उतर आए हैं। उनके हाथों में कटआउट हैं, जुबान पर कड़े तेवर हैं और सीने में व्यवस्था के खिलाफ एक अजीब सी आग है!

आखिर माजरा क्या है? माजरा है मतदाता सूची के उस ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न’ (एसआईआर) का, जिसे लेकर सियासत का पारा सातवें आसमान पर है। विपक्ष का सीधा और गंभीर आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में नियमों की ऐसी धज्जियां उड़ाई गईं कि लोकतंत्र की नींव हिल गई। राहुल गांधी जैसे नेता जब यह कहते हैं कि “यह देशद्रोह है, चाहे प्रधानमंत्री मोदी हों, अमित शाह हों या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, किसी को नहीं बख्शेंगे,” तो यह सिर्फ एक बयान नहीं होता, बल्कि सत्ता के गलियारों को हिला देने वाली एक हुंकार होती है।

अरे साहब, लोकतंत्र का यह कैसा अजीब दौर आ गया है कि विपक्ष के नुमाइंदे अपनी बात रखने के लिए चुनाव आयोग के पास पहुंचते हैं, लेकिन आयोग के दरवाजे उनके लिए बंद मिलते हैं! क्या देश के मुख्य चुनाव आयुक्त का यह दायित्व नहीं था कि वे करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले इन सांसदों की बात सुनते? पुलिस उन्हें रोकती है, बैरिकेड्स पर रोक-टोक होती है, और अंत में इन नेताओं को हिरासत में ले लिया जाता है। अरे भाई, अगर संवाद के सारे रास्ते ही बंद हो जाएंगे, तो जनता और उसके नुमाइंदे सड़क पर नहीं तो क्या बैकुंठ में जाकर अपनी फरियाद लगाएंगे?

और इधर सत्ता पक्ष के संबित पात्रा और सुधांशु त्रिवेदी जैसे प्रवक्ता भी कहां चुप बैठने वाले हैं! वे पलटवार करते हुए कह रहे हैं कि यह सब राहुल गांधी को ‘फिर से लॉन्च करने’ और देश में भ्रम फैलाने का एक सियासी षड्यंत्र है। उनका तर्क है कि एसआईआर के विरोध के जरिए विपक्ष उन मृत या फर्जी मतदाताओं को बचाना चाहता है जो सूची में लंबे समय से शुमार हैं।

लेकिन बात यहां आकर नहीं रुकती! इस आग में घी डालने का काम किया भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की उस टिप्पणी ने, जिसने सोमवार को यह कहकर सनसनी फैला दी कि फॉर्म-6 में किया गया बदलाव सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंजूर नहीं किया गया था। अब जरा सोचिए—एक तरफ चुनाव आयोग का यह दावा कि इस बदलाव को सर्वोच्च अदालत की हरी झंडी मिल चुकी है, और दूसरी तरफ सीजेआई की यह दो टूक बात! फिर तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह फॉर्म-6 का खेल किसने और किसके आदेश पर खेला?

वरिष्ठ लेखकों के अंदाज में कहें तो भाई, इस देश की राजनीति में सच और फरेब की इस धुंध के बीच पिस तो सिर्फ आम आदमी रहा है। चुनाव आते हैं, वोट पड़ते हैं, सरकारें बनती हैं और गिरती हैं, लेकिन इस उठापटक के बीच क्या सचमुच हमारा लोकतंत्र और हमारी निर्वाचन संस्थाएं अपनी गरिमा बचा पा रही हैं? आज ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की जो माँग सड़कों पर गूंज रही है, वह सिर्फ एक कुर्सी की लड़ाई नहीं है, बल्कि उस भरोसे की लड़ाई है जो इस देश के हर नागरिक का अपनी चुनाव प्रणाली पर होना चाहिए।

देखना यह है कि सत्ता के इन ऊंचे पर्वतों और विपक्ष की इन सड़क की लड़ाइयों के बीच, लोकतंत्र का यह ऊंट किस करवट बैठता है!

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