
उदयपुर। उदयपुर की राजनीति में इन दिनों ‘आरोपों’ का दौर गर्म है। भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं और पूर्व पदाधिकारियों पर लगे गंभीर आरोपों ने न केवल संगठन के भीतर हड़कंप मचा दिया है, बल्कि शहर के सियासी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या व्यक्तिगत स्तर पर लगे इन आरोपों की आंच पार्टी की सामूहिक छवि को भी झुलसा रही है?
हाल ही में सामने आए दो मामलों ने भाजपा की आंतरिक राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। पहला मामला पूर्व पार्षद पर दुष्कर्म के आरोप का है। एक युवती द्वारा भाजपा के पूर्व पार्षद के विरुद्ध केस दर्ज कराए जाने के बाद कार्यकर्ताओं में भारी असमंजस की स्थिति है। कथित रूप से पार्टी की ही एक महिला नेता द्वारा एक वकील पर दुष्कर्म के आरोप लगाए जाने के बाद कानूनी और राजनीतिक दांव-पेंच और उलझ गए हैं। हालांकि इन मामलों में पार्टी की ओर से अभी तक कोई बयान जारी नहीं किया है।
जांच और न्याय प्रक्रिया के बीच फंसी छवि : कानूनी तौर पर यह स्पष्ट है कि ये अभी केवल ‘प्रथम दृष्टया आरोप’ हैं। पुलिस की तफ्तीश, साक्ष्यों का संकलन और अदालत में ट्रायल की लंबी प्रक्रिया के बाद ही यह तय होगा कि ये आरोप साबित होते हैं या खारिज। लेकिन राजनीति का व्याकरण अदालत से अलग होता है। यहां ‘परसेप्शन’ (धारणा) का खेल चलता है। आरोप साबित होने में लंबा समय लगेगा, लेकिन सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों पर जब ऐसे लांछन लगते हैं, तो वे संबंधित व्यक्ति की छवि को तो तत्काल प्रभावित करते ही हैं, साथ ही उनके राजनीतिक ‘मदर ऑर्गेनाइजेशन’ (संगठन) पर भी सवालिया निशान खड़े करते हैं।”
संगठन में मंथन और गिरेबां की राजनीति : पार्टी के भीतर इस समय जबरदस्त चर्चा है। इस मुद्दे पर भाजपा दो खेमों में बंटी नजर आ रही है। आत्मचिंतन बनाम चुप्पी : एक धड़ा ऐसा है जो इसे पार्टी के अनुशासन और छवि के लिए घातक मानकर चुपचाप आत्मचिंतन कर रहा है।
गॉसिप और सियासी मजे: दूसरी ओर, राजनीति की रीत के अनुसार विपक्षी और विरोधी खेमे ‘दूसरों के गिरेबां’ में झांकने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। जो लोग खुद विवादों में रहे हैं, उन्होंने चुप्पी साध रखी है, लेकिन जो बेदाग होने का दावा करते हैं, वे इस गॉसिप का लुत्फ उठा रहे हैं।
क्या यह ‘इमेज डैमेज’ है? : उदयपुर जैसे अनुशासित राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले शहर में भाजपा के लिए ये घटनाक्रम किसी चुनौती से कम नहीं हैं। हालाँकि पार्टी नेतृत्व अक्सर इसे ‘निजी मामला’ बताकर पल्ला झाड़ लेता है, लेकिन जनता के बीच जवाबदेही और नैतिक शुचिता के पैमानों पर पार्टी को घेरा जा रहा है। आने वाले समय में संगठन इन विवादित चेहरों से कितनी दूरी बनाता है, इसी पर भाजपा की ‘डैमेज कंट्रोल’ रणनीति निर्भर करेगी।
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