उदयपुर नगर निगम 272 भूखंड घोटाला : जाली दस्तावेजों से धोखाधड़ी के आरोपी राजेंद्र की अग्रिम जमानत याचिका कोर्ट ने की खारिज

 

उदयपुर। न्यायालय अपर सेशन न्यायाधीश (क्रम संख्या 2, उदयपुर) की पीठासीन अधिकारी दमयंती पुरोहित (RJS) ने उदयपुर नगर निगम के बेशकीमती भूखंडों के फर्जीवाड़े से जुड़े एक गंभीर मामले में आरोपी राजेंद्र (59 वर्ष) की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने मामले की गंभीरता और आरोपी की भूमिका को देखते हुए उसे अग्रिम जमानत का लाभ देना न्यायोचित नहीं माना।

क्या है पूरा मामला? : मामला वर्ष 2022 का है, जब नगर निगम उदयपुर की विधि अधिकारी श्रीमती दीपिका ने हिरणमगरी थाने में एक लिखित रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। रिपोर्ट के अनुसार, नगर विकास न्यास (UIT) से नगर निगम उदयपुर को हस्तांतरित योजनाओं के कई भूखंडों पर अनधिकृत कब्जों की जांच के लिए महापौर द्वारा एक समिति गठित की गई थी।

जांच में सामने आया कि हिरणमगरी के सेक्टर 3, 4, 5 और 6 स्थित कई महत्वपूर्ण भूखंडों की पत्रावलियों में कूटरचित (फर्जी) आवंटन पत्र शामिल किए गए थे। इन पत्रों में मूल राशि जमा नहीं होने के बावजूद, बैंक या विभाग की फर्जी मोहरें लगाकर फाइलें नगर निगम को ट्रांसफर करवा दी गईं। आवेदकों द्वारा नामांतरण, लीज-डीड और निर्माण स्वीकृति के लिए जो दस्तावेज पेश किए गए, वे पूरी तरह जाली और फर्जी हस्ताक्षरों से तैयार किए गए थे। इस पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 और 120B के तहत मामला दर्ज किया था।

आरोपी और सरकारी वकील की दलीलें : सुनवाई के दौरान आरोपी राजेंद्र के वकील बजरंग सिंह राणावत ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने केवल एक गवाह के रूप में हस्ताक्षर किए थे और वे जांच में पूरा सहयोग कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी वरिष्ठ नागरिक हैं और बीमार रहते हैं, इसलिए उन्हें राहत दी जाए।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से अपर लोक अभियोजक दिनेश गुप्ता ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि आरोपी अन्य मुख्य मुलजिमों के साथ मिलकर कूटरचित दस्तावेज तैयार करने में सहयोगी रहा है। आरोपी की पत्नी के नाम पर भी दो आवासीय भूखंडों का पंजीकरण करवाया गया था। सरकारी वकील ने यह भी खुलासा किया कि आरोपी के विरुद्ध थाना सवीना और थाना सूरजपोल में भी इसी तरह के धोखाधड़ी के मामले दर्ज हैं।

कोर्ट ने क्यों खारिज की अग्रिम जमानत?

न्यायालय ने दोनों पक्षों की बहस सुनने और अनुसंधान पत्रावली का अवलोकन करने के बाद पाया कि आरोपी ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर एक योजनाबद्ध तरीके से सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत से नगर निगम की बेशकीमती जमीनों को हड़पने का काम किया है। इस संगठित अपराध से सरकार और उन आम लोगों को भारी नुकसान पहुंचा है जिन्होंने इन फर्जी दस्तावेजों पर भरोसा कर भूखंड खरीदे थे। कोर्ट ने परिस्थितियों को गंभीर मानते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482 के तहत प्रस्तुत अग्रिम जमानत याचिका को पूरी तरह अस्वीकार कर खारिज कर दिया।

 

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