
नई दिल्ली/पुणे।
देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET (UG) अब सवालों के घेरे में नहीं, बल्कि शर्मिंदगी के दलदल में है। CBI द्वारा पुणे से केमेस्ट्री प्रोफेसर पीवी कुलकर्णी की गिरफ्तारी ने यह साफ कर दिया है कि पेपर लीक का कैंसर व्यवस्था की जड़ों तक फैल चुका है। जिस प्रोफेसर को छात्रों का भविष्य संवारना था, वही ‘मास्टरमाइंड’ बनकर पेपर के सौदे कर रहा था।
एक तरफ मौत का मातम, दूसरी तरफ ‘लीक माफिया’ का अट्टहास
एक तरफ CBI की जांच में ‘प्राइवेट माफिया’ जैसे टेलीग्राम ग्रुप्स और करोड़ों के लेनदेन का खुलासा हो रहा है, तो दूसरी तरफ उन मासूमों की लाशें बिछ रही हैं जिन्होंने इस सिस्टम की नाकामी के आगे घुटने टेक दिए।
दिल्ली, लखीमपुर खीरी और गोवा से आए तीन सुसाइड के मामले रूह कंपा देने वाले हैं।
वे छात्र जो डॉक्टर बनकर जान बचाना चाहते थे, आज व्यवस्था की भेंट चढ़ गए। क्या यह महज ‘आत्महत्या’ है या सिस्टम द्वारा की गई ‘संस्थानिक हत्या’?
पैनल एक्सपर्ट ही निकला गद्दार?
यह खबर देश के हर ईमानदार छात्र के गाल पर तमाचा है कि जो व्यक्ति खुद NEET पेपर तैयार करने वाले पैनल का हिस्सा रहा हो, वही पेपर लीक कर रहा था।
पहुंच का फायदा: कुलकर्णी के पास पेपर तक सीधी पहुंच थी। यह नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की चयन प्रक्रिया और सुरक्षा ऑडिट पर सबसे बड़ा सवालिया निशान है।
डिजिटल माफिया: टेलीग्राम पर पासवर्ड प्रोटेक्टेड फाइलें (LeakMafia@9466) घूमती रहीं, लेकिन एजेंसियां सोती रहीं। 1 मई को ही पेपर लीक हो गया, फिर भी परीक्षा आयोजित की गई—यह प्रशासनिक अक्षमता की पराकाष्ठा है।
भरोसे की नीलामी : 10 से 12 लाख रुपये में भविष्य की नीलामी की गई। जिनके पास पैसा था, उन्हें 100% मैच होने वाले सवाल (जैसे प्रिज्म और वेलोसिटी वाले प्रश्न) परोस दिए गए।
“जब परीक्षा की शुचिता ही खत्म हो जाए, तो डिग्री और डॉक्टर की साख कैसे बचेगी? यह महज पेपर लीक नहीं, देश के स्वास्थ्य भविष्य के साथ किया गया क्रूर मजाक है।”
सुलगते सवाल
CBI भले ही कस्टडी लेकर पूछताछ कर रही है, लेकिन उन तीन घरों के चिराग कौन जलाएगा जो बुझ चुके हैं? रितिक, जो तीसरी बार कोशिश कर रहा था, या वह 17 साल का लड़का जो प्रतियोगी परीक्षाओं के नाम से ही खौफ में आ गया—इनकी मौत का जिम्मेदार कौन है? क्या चंद गिरफ्तारियों से यह सड़ांध खत्म होगी, या फिर अगले साल फिर किसी ‘कुलकर्णी’ का इंतज़ार किया जाएगा?
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