अंधेरी राहों में उजाला : संमिधा संस्थान की चार साल की तपस्या लाई रंग, दृष्टिबाधित शंभू लाल ने पाई सरकारी नौकरी

उदयपुर। कहते हैं कि अगर हौसलों में उड़ान हो, तो किस्मत की लकीरें भी अपना रास्ता बदल लेती हैं। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है उदयपुर के “संमिधा दृष्टि दिव्यांग मिशन” के होनहार छात्र शंभू लाल मीणा ने। आँखों में भले ही दुनिया का उजाला न हो, लेकिन शंभू ने अपने मन के अटूट विश्वास और संमिधा संस्थान की बरसों की निस्वार्थ तपस्या के दम पर वह मुकाम हासिल कर लिया, जो हर युवा का सपना होता है।

पशु परिचर भर्ती परीक्षा में अपनी सफलता का परचम लहराने के बाद, आज शंभू लाल ने जब राजकीय पशु चिकित्सालय उपकेंद्र, बगेड़ी (लसाड़िया) में पशु परिचर के पद पर कार्यग्रहण किया, तो वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें खुशी से नम हो गईं।

कार्यग्रहण के इस भावुक कर देने वाले पल में लसाड़िया की BVHO प्रभारी श्रीमती सोनल कुमारी कोटेड ने शंभू को पदभार ग्रहण कराया। इस ऐतिहासिक और गौरवमयी पल के साक्षी बने शंभू लाल के बुजुर्ग पिता नाथा मीणा और भाई प्रकाश मीणा। अपने बेटे को इस मुकाम पर देखकर पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया और उनकी बूढ़ी आँखों से बहते आंसुओं ने उस हर एक संघर्ष की कहानी बयां कर दी, जो इस परिवार ने झेली थी।

इस मौके पर संस्थान के संभाग प्रभारी मुकेश कुमार जाट और अस्पताल स्टाफ के सांवरचंद मीणा, संगीता मीणा व महेंद्र चौधरी ने शंभू का स्वागत करते हुए उसके इस जज्बे को सलाम किया।

संस्थान के अध्यक्ष डॉ. चंद्रगुप्त सिंह चौहान ने बेहद भावुक होते हुए बताया कि चार साल पहले तक उदयपुर संभाग में इन विशेष बच्चों के लिए रहने और पढ़ने की कोई माकूल व्यवस्था नहीं थी। ऐसे मुश्किल समय में संमिधा संस्थान ने एक संकल्प लिया और नगर निगम से एक अस्थायी भवन मांगकर इस निःशुल्क छात्रावास की शुरुआत की।

आज इसी आशियाने में करीब 25 दृष्टिबाधित छात्र अपनी आँखों के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। शंभू की इस कामयाबी ने हॉस्टल के बाकी बच्चों के दिलों में भी एक नई उम्मीद का दीया जला दिया है। अब उन सब का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है कि ‘अगर शंभू कर सकता है, तो हम भी कर सकते हैं।’

सेवा और समर्पण की मिसाल: संमिधा संस्थान के स्वयंसेवकों के त्याग और लगन का ही नतीजा है कि इस पवित्र आंगन से हर साल दो से तीन विद्यार्थी सरकारी नौकरी पाकर अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। संमिधा संस्थान की यह अनूठी पहल आज समाज को यह सिखा रही है कि सहानुभूति से कहीं ज्यादा बड़ी शक्ति ‘अवसर’ देने में है। शंभू की यह जीत सिर्फ उसकी अकेले की नहीं, बल्कि हार न मानने वाले उस मानवीय जज्बे की जीत है जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कुराना जानता है।

 

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