उदयपुर नगर निगम डिप्टी मेयर चुनाव : एक वोट का रहस्य और ब्राह्मण सियासत का ढलता सूरज

फोटो : कमल कुमावत

उदयपुर। सिनेमा के सुनहरे दौर में जब निर्देशक महबूब ख़ान या के. आसिफ़ किसी फ्रेम को तराशते थे, तो परदे के मुख्य किरदार की चमक के पीछे खड़े उस वफ़ादार दरबारी पर भी एक हल्की-सी लाइट ज़रूर डालते थे, जिसकी तक़दीर में ताज नहीं, सिर्फ़ वज़ीर की पगड़ी लिखी होती थी। उदयपुर के नगर निगम के इस नए सियासी ड्रामे का क्लाइमेक्स भी ठीक उसी तरह का है। बनना जिन्हें नगर का प्रथम नागरिक यानी शहंशाह था, वे अंततः उप-महापौर की दोयम कुर्सी पर क़ाबिज़ करा दिए गए। दिनेशचंद्र भट्ट, जो कभी संगठन के सबसे बड़े सिपहसालार हुआ करते थे, वे अब पारस सिंघवी के बगल वाली कुर्सी पर बैठेंगे।

मगर राजनीति, राजकपूर की ‘मेरा नाम जोकर’ की तरह है—दिखने में जोकर हंस रहा होता है, पर दिल के किसी कोने में अनकहे अफ़साने दफ़न होते हैं। चुनाव ख़त्म हुआ, नारेबाज़ी थमी, आचार संहिता की बंदिशें हट गईं, लेकिन टाउनहॉल की दीवारों से टकराकर अब दो सवाल हवा में तैर रहे हैं।

पहला सवाल उस एक वोट के रहस्य का है। अंकगणित का पर्दा जब उठा, तो 80 पार्षदों वाले सदन में दिनेश भट्ट के खाते में 56 वोट दर्ज थे, जबकि एक दिन पहले मेयर बने पारस सिंघवी को 55 वोट मिले थे। कांग्रेस के लक्ष्मीनारायण मेघवाल 24 पर सिमट गए। आख़िर वह 56वां वोट किसका था? क्या वह विपक्ष के किसी बागी का था, या फिर सत्ताधारी कुनबे के भीतर ही किसी ने दबे पाँव चलकर यह पैग़ाम दिया कि संगठन के पुराने वफ़ादार का रसूख आज भी ‘शहंशाह’ से एक क़दम आगे है? यह महज एक वोट नहीं था, राजनीति की भाषा में इसे ‘मौन विद्रोह’ का हस्ताक्षर कहा जाता है।

और दूसरा सवाल, जो बहुत गहरा और चुभने वाला है—मेवाड़ की राजनीति में ब्राह्मण नेतृत्व का यह कैसा ढलान है? यह वही उदयपुर है जहां कभी राजनीति का केंद्र बिंदु इसी तबके के इर्द-गिर्द घूमता था। मगर आज भाजपा के भीतर ब्राह्मण चेहरे हर बार आख़िरी मोड़ पर आकर पिछड़ क्यों जाते हैं? जब मेयर की गद्दी की बात आई, तो भट्ट साहब को किनारे कर दिया गया; और जब डिप्टी मेयर की बारी आई, तो भी सवेरे पौने दस बजे तक सस्पेंस का ऐसा थ्रिलर रचा गया गोया कोई आखिरी ओवर की गेंद फेंक रहा हो।

मदन राठौड़ अपने रिश्तेदार पंकज बोराणा की वकालत कर रहे थे, संघ की ओर से कविता जोशी का नाम बैकअप में चल रहा था। अगर शहर विधायक ताराचंद जैन, सतीश पूनिया और दिल्ली से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का दबाव न होता, तो शायद यह कुर्सी भी हाथ से फिसल जाती। वरिष्ठता को जब ख़ैरात की तरह तौलकर दिया जाए, तो वह जीत होकर भी एक अदद समझौते जैसी लगती है।

बुधवार को पारस सिंघवी और दिनेश भट्ट आभार यात्रा निकालेंगे, गाजे-बाजे बजेंगे, गुलाल उड़ेगा और विक्ट्री साइन दिखाए जाएंगे। परदे पर सब कुछ मुकम्मल और भव्य दिखेगा। मगर दर्शकों को मालूम है कि जो तालियां आज बज रही हैं, उनमें उस दर्द की अनुगूंज भी शामिल है जो उस वक्त पैदा होती है जब एक काबिल अभिनेता को उसकी मनपसंद मुख्य भूमिका से महरूम कर सिर्फ़ सह-नायक के रोल से बहला दिया जाता है। राजनीति का यह शो चलता रहेगा, मगर इस एक वोट की चुभन और ब्राह्मण सियासत की बेबसी का यह सीन इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए महफ़ूज़ रहेगा।

 

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