लेंस की ज़ुबान : फ़्रेम में दर्ज मुस्कुराहटें, आंखों के सन्नाटे और कल-आज का फ़र्क़

एक फ़ोटो जर्नलिस्ट के लिए कैमरा महज़ तसवीरें खींचने का पुर्ज़ा नहीं होता, वह सियासत

एक फ़ोटो जर्नलिस्ट के लिए कैमरा महज़ तसवीरें खींचने का पुर्ज़ा नहीं होता, वह सियासत के चेहरे पर चढ़े उस गाढ़े मेकअप को खुरचकर भीतर का सच बेनक़ाब करने वाली तीसरी आंख होता है। उदयपुर नगर निगम के टाउनहॉल में जब बीजेपी के पूर्व ज़िलाध्यक्ष दिनेशचंद्र भट्ट को उप-महापौर (डिप्टी मेयर) चुना गया, तो शटर की आवाज़ के साथ सिर्फ़ चेहरों के पोज़ नहीं, बल्कि राजनीति की अंदरूनी करवटें भी ‘क्लिक’ हो रही थीं।

कैमरे के व्यूफ़ाइंडर से गुज़रते इस जश्न में मैंने रंगीन अबीर-गुलाल देखा, गगनभेदी नारे सुने और फूलों के भारी हार भी देखे। लेकिन एक फ़ोटो जर्नलिस्ट की असली तलाश हुजूम नहीं, ‘एक्सप्रेशन्स’ होते हैं—वह फ़्रेम जो इतिहास को बिना बोले बयान कर दे।

फ़ोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत के लेंस ने आज जिस सियासत को क़ैद किया है, वह हमारे उन सुधी पाठकों के लिए एक खुला इम्तिहान है जो ‘चेहरे पढ़ने’ के हुनर में माहिर हैं। ज़रा इन तस्वीरों को महज़ सरसरी नज़र से मत देखिए; इनमें गहरे उतरिए, चेहरों की सिलवटों को ज़ूम कीजिए और उस मंज़िल तक पहुँचिए जिसे राजनीति के दस्तावेज़ कभी दर्ज नहीं करते।

ज़रा गौर से देखिए इन फ़्रेम्स को—

कल का फ्रेम, आज का फ्रेम : जो चेहरे कल पारस सिंघवी की ताजपोशी पर विक्ट्री साइन बनाते हुए कहकहे लगा रहे थे, क्या आज दिनेश भट्ट के गले में माला डालते वक्त उनकी आंखों में वही स्वाभाविक चमक थी, या सिर्फ़ होंठों की बनावटी मुस्कान?

अचानक उभरे किरदार : आज जो लोग जीत के जश्न में भट्ट साहब के सबसे क़रीब खड़े होकर कैमरे के केंद्र में आने को बेताब थे, क्या कल वो पारस जी के किसी भी फ़्रेम के हाशिए पर भी नज़र आए थे?

मुस्कानों का द्वंद्व : एक ही पार्टी, एक ही नगर निगम, चौबीस घंटे का फ़ासला—मगर कैमरे ने पकड़ा कि दोनों दिनों की मुस्कानों में कितना फ़र्क़ था। एक तरफ़ सत्ता पाने का दंभ था, तो दूसरी तरफ़ वो तसल्ली, जो बगावत और समझौते के बीच से निकलकर एक वोट ज़्यादा खींच लाने के बाद चेहरे पर उतरती है।

तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोलतीं, अगर देखने वाली आंख में सच परखने का सलीक़ा हो। रोशनी और साए के इस खेल में किसने वफ़ादारी निभाई, किसने मजबूरी में हाथ मिलाया, और किसने कैमरे की तरफ़ देखकर महज़ ‘पोज़’ दिया—यह सब इन तस्वीरों में साफ़-साफ़ दर्ज है।

उठाइए अपनी नज़र, देखिए इन फ़्रेम्स को, और पढ़िए वो अनकही दास्तान जो सिर्फ़ एक फ़ोटो जर्नलिस्ट का लेंस ही जनता के सामने परोस सकता है।

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