एमबी अस्पताल की पड़ताल : तीसरी मंजिल पर मेडिसिन वार्ड, लेकिन कई दिनों से लिफ्ट खराब; सीढ़ियों पर स्ट्रेचर-व्हीलचेयर खींचने को मजबूर तीमारदार

इमरजेंसी में सुधरी व्यवस्थाओं के बीच संसाधनों और स्टाफ की कमी से जूझ रहे मरीज, ईसीजी की एक ही मशीन चालू, एक एक्स-रे रूम पर लटका ताला

उदयपुर: संभाग के सबसे बड़े महाराणा भूपाल (एमबी) राजकीय चिकित्सालय में व्यवस्थाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अस्पताल के ट्रोमा व मेडिसिन वार्ड में कई दिनों से लिफ्ट खराब पड़ी है, जिसके चलते गंभीर मरीजों को तीसरी मंजिल तक ले जाना बेहद कष्टकारी और जोखिम भरा साबित हो रहा है।

तीसरी मंजिल पर स्थित मेडिसिन वार्ड में मरीजों का भारी दबाव है, लेकिन लिफ्ट बंद होने के कारण तीमारदारों को मरीजों को स्ट्रेचर और व्हीलचेयर के सहारे ऊपर ले जाने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। जिन मरीजों के साथ पर्याप्त परिजन या तीमारदार नहीं हैं, उनके लिए स्थिति और भी विकट हो जाती है।

इमरजेंसी में स्ट्रेचर मिले, पर वार्ड बॉय और डॉक्टरों की कमी

अस्पताल की इमरजेंसी विंग में पहले की तुलना में कुछ सुधार जरूर नजर आया है। यहां पर्याप्त संख्या में स्ट्रेचर और व्हीलचेयर उपलब्ध हैं, लेकिन व्यवस्थाओं को सुचारू चलाने के लिए जरूरी स्टाफ का टोटा बना हुआ है:

वार्ड बॉय की किल्लत : इमरजेंसी में स्ट्रेचर और व्हीलचेयर तो हैं, लेकिन उन्हें खींचने और मरीजों को शिफ्ट करने के लिए वार्ड बॉय की भारी कमी खल रही है।

मरीजों की कतार : मरीजों की भारी आवक के बावजूद इमरजेंसी में डॉक्टरों की दो टेबल खाली रहने से उपस्थित चिकित्सकों पर दबाव अधिक दिखा, जिससे मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ा।

जांचों में लग रहे घंटों, एक ही मशीन पर टिकी पूरी ईसीजी व्यवस्था

जांच विंग में मरीजों की लंबी कतारें अस्पताल के लचर प्रबंधन को बयां कर रही हैं:

ईसीजी रूम में कतारें : अस्पताल में ईसीजी जांच केवल एक ही मशीन के भरोसे चल रही है। मरीजों के भारी दबाव को देखते हुए यहां कम से कम तीन मशीनों और अतिरिक्त तकनीकी स्टाफ की तत्काल आवश्यकता है।

एक्स-रे का एक रूम बंद: एक्स-रे के लिए बने दो कमरों में से एक कमरा बंद मिला, जिसके चलते एक ही रूम के बाहर मरीजों की लंबी कतारें लगी रहीं।

प्राथमिक उपचार के बजाय जांचों पर जोर

पड़ताल के दौरान यह बात भी सामने आई कि इमरजेंसी में पहुंचने वाले गंभीर मरीजों को डॉक्टर की टेबल पर तुरंत पहली खुराक (प्राथमिक दवा) देकर राहत पहुंचाने के बजाय सीधे जांचें करवाने भेज दिया जाता है। जांच प्रक्रिया पूरी कराने में ही मरीजों के 1 से 2 घंटे निकल जाते हैं, जिससे गंभीर अवस्था में पहुंचे मरीजों की पीड़ा और बढ़ जाती है।

 

About Author

Leave a Reply