
उदयपुर। झीलों के शांत पानी के बीच उदयपुर नगर निगम की राजनीति में ऐसा सियासी तूफान उठा है कि भाजपा के बड़े-बड़े रणनीतिकारों के पसीने छूट रहे हैं। लोकतंत्र के इस मंच पर टिकट वितरण की प्रक्रिया किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म के क्लाइमेक्स में बदल चुकी है। पार्टी को विपक्षी खेमे की चुनौती से कहीं ज्यादा अपने ही ‘अपनों’ की बगावत का डर सता रहा है। आलम यह है कि उदयपुर के वार्डों के लिए तैयार रखी गई प्रत्याशियों की अधिकृत सूची को जेब से बाहर निकालने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा।
जिन संभावित दावेदारों को जयपुर या स्थानीय आकाओं से ‘हरी झंडी’ के इशारे मिले थे, वे बैंड-बाजे और जीत की मालाओं का ऑर्डर बुक करा चुके थे, लेकिन लिस्ट सार्वजनिक न होने के फरमान ने उनके चेहरों की मुस्कान पर ब्रेक लगा दिया है।
उदयपुर में बीजेपी का ‘जासूसी’ सिंबल फॉर्मूला
बगावत के किसी भी बड़े विस्फोट और भितरघात को रोकने के लिए संगठन ने उदयपुर में एक ऐसा ‘सीक्रेट ऑपरेशन’ लागू किया है:
सार्वजनिक सूची पर पूर्ण वीटो : शहर के किसी भी वार्ड की सूची सार्वजनिक तौर पर जारी नहीं की जाएगी, ताकि टिकट कटने से नाराज दावेदारों को पोस्टर फाड़ने, पुतले फूंकने या बगावती तेवर दिखाने का मौका ही न मिले।
गोपनीय मेल और सीधे सिंबल वितरण : प्रदेश मुख्यालय से सीधे स्थानीय विधायकों और जिलाध्यक्ष को ईमेल के जरिए अधिकृत नाम भेजे जा रहे हैं। इसके बाद तय उम्मीदवार को चुपके से बुलाकर खाली सिंबल पर दस्तखत कर थमाया जा रहा है—यानी ‘सीधे नामांकन दाखिल करो और मैदान में उतरो, सोचने-संभलने की फुर्सत किसी को नहीं।’
गुटबाजी और खींचतान : उदयपुर के वार्डों में दावेदारों की लंबी कतार और स्थानीय नेताओं की पैरवी ने रायशुमारी को नूराकुश्ती में बदल दिया। हर गुट अपने खास मोहरे को फिट करने में लगा रहा, जिसके चलते अंततः पार्टी को यह ‘गुप्त रणनीति’ अपनानी पड़ी।
वार्डों में पसरी बेचैनी : किसका कटा पत्ता, किसे मिला मौका?
उदयपुर नगर निगम के कई प्रमुख वार्डों में टिकट वितरण को लेकर भारी घमासान की स्थिति है:
असमंजस में दावेदार : संभावित उम्मीदवार रात-रात भर अपने संपर्कों के जरिए यह टटोलने में लगे हैं कि मेल में उनका नाम आया या नहीं। कई पुराने कार्यकर्ताओं और दावेदारों को ऐन वक्त पर बाहर का रास्ता दिखाए जाने की चर्चाओं से अंदरूनी नाराजगी चरम पर है।
निर्दलीय उतरने की फुसफुसाहट : पार्टी की इस खामोशी से नाराज कई दावेदारों ने गुपचुप तरीके से निर्दलीय पर्चा भरने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। बागियों का रुख भांपते हुए संगठन के रणनीतिकार भी पल-पल की रिपोर्ट जयपुर भेज रहे हैं।
लेकसिटी के इस सियासी दंगल में मोहरे भले ही नए नियमों से चले जा रहे हों, लेकिन जब टिकट की महत्वाकांक्षा बगावत का रूप लेती है, तो बंद लिफाफों की सील टूटते देर नहीं लगती। अब देखना यह है कि रात के अंधेरे में थमाए जा रहे ये ‘गुप्त सिंबल’ दिन के उजाले में निगम की सत्ता दिलाते हैं या भीतरघात का नया अध्याय खोलते हैं।
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