वार्ड-33 के प्रत्याशी जतिन श्रीमाली की कलम से

उदयपुर की सियासत में कम्यूनिटी फर्स्ट की दस्तक : वार्ड 33 की गलियों से उठती बुनियादी हक, सार्वजनिक संसाधन और नई पीढ़ी की सीधी भागीदारी की आवाज

 

उदयपुर। किसी भी शहर का मिजाज उसकी ऊंची इमारतों या भव्य स्वागत द्वारों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि उसकी तंग बस्तियों और आम गलियों में रहने वाले बाशिंदों को बुनियादी सहूलियतें किस दर्जे की मिल रही हैं। उदयपुर नगर निगम के वार्ड संख्या 33 की दहलीज पर खड़ा होकर जब मैं यहां के रोजमर्रा के जीवन को देखता हूं, तो एक बात बिल्कुल साफ नजर आती है—स्थानीय निकायों की राजनीति अब तक सिर्फ सत्ता की अदला-बदली और कागजी फाइलों तक सीमित रही है, जबकि जरूरत इसे सीधे जनता की रसोई, बच्चों के बस्ते और साफ पानी के नल से जोड़ने की है।

वार्ड 33 केवल एक चुनावी हलका नहीं, बल्कि मेरी अपनी परवरिश की जमीन है। यहां के मुद्दे कोई अज्ञात पहेली नहीं हैं, बल्कि वे रोज की जरूरतें हैं जिनसे हर परिवार दो-चार होता है।

जब अधिकार दया नहीं, प्राथमिकता बनें: सेवा से व्यवस्था निर्माण की ओर

सार्वजनिक जीवन में अक्सर समाजसेवा को चुनावी मौसम का दिखावा बना दिया जाता है, जबकि यह नागरिक अधिकारों की सतत लड़ाई होनी चाहिए:

शिक्षा और बुनियादी संसाधन: सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कामगार और सामान्य परिवारों के बच्चों के लिए किताबें, कापियां और स्कूल ड्रेस कोई ‘उपहार’ नहीं, बल्कि उनका बुनियादी हक हैं। जब एक सरकारी स्कूल में शीतल पेयजल के लिए आरओ-कूलर की व्यवस्था की जाती है, तो वह केवल एक मशीन नहीं होती, बल्कि यह तय करती है कि किसी बच्चे की पढ़ाई प्यास या अस्वच्छ पानी के कारण न छूटे।

स्वास्थ्य और पोषण की गरिमा: अस्पतालों के बाहर अपनी लाचारी छुपाए खड़े तीमारदारों और जरूरतमंदों के लिए जब दो वक्त के सम्मानजनक भोजन की बात आती है, तो यह केवल परोपकार नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का वह ढांचा है जिसे नगर प्रशासन की नीतियों का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए।

पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था: रोजगार से सीधे जुड़ें वार्ड के युवा

उदयपुर अंतरराष्ट्रीय पर्यटन का प्रमुख केंद्र है, मगर शहर की इस दौलत और पहचान का वास्तविक लाभ वार्ड के साधारण युवाओं तक कितना पहुंचता है, यह बड़ा सवाल है:

होटल व टूरिज्म सेक्टर का अनुभव: होटल एसोसिएशन में सेक्रेटरी के तौर पर काम करते हुए और साथियों के साथ विभिन्न पर्यटन मॉडल—जैसे स्टैच्यू ऑफ यूनिटी आदि—का जमीनी अध्ययन करने के बाद मेरा यह स्पष्ट मानना है कि स्थानीय पर्यटन केवल बड़ी कंपनियों का मुनाफा बनकर न रहे।

नई पीढ़ी (Gen-Z) का नजरिया: आज का नौजवान खोखले नारों से ऊब चुका है। वह पारदर्शी प्रक्रिया, आधुनिक कौशल और स्थानीय स्तर पर सम्मानजनक आजीविका चाहता है। कॉलेज के दिनों में छात्र आंदोलनों के दौरान एडमिशन, फीस और री-इवैल्युएशन की अनियमिताओं के खिलाफ जो संघर्ष शुरू हुआ था, वही तेवर आज नगर निगम के बंद कमरों में आम नागरिकों के हक के लिए आवाज उठाने की ऊर्जा देता है।

‘हमारी गलियां, हमारे फैसले’: जनभागीदारी पर आधारित स्थानीय प्रशासन

यह चुनावी प्रक्रिया किसी एक चेहरे को पद दिलाने की औपचारिकता नहीं, बल्कि उस सोच को बदलने का जरिया है जहां सत्ता ऊपर से थोपी जाती है:

निर्णयों में जनता की सीधी हिस्सेदारी : वार्ड के बजट का आवंटन कहां हो, नालियों और सड़कों की मरम्मत पहले किस मोहल्ले में हो, और सार्वजनिक पार्कों का रखरखाव कैसे किया जाए—इन सब पर फैसला किसी बंद दफ्तर में नहीं, बल्कि मोहल्ला सभाओं में वार्डवासियों की खुली मौजूदगी में होना चाहिए।

पारदर्शिता और जवाबदेही : जनता का टैक्स सीधे तौर पर जनता की गलियों में नजर आना चाहिए।

शहर केवल पत्थरों और झीलों का नाम नहीं है, शहर उन लोगों की सामूहिक उम्मीदों से बनता है जो हर सुबह अपनी मेहनत से इसकी धड़कन को जिंदा रखते हैं। वार्ड 33 से यह भागीदारी केवल एक चुनाव लड़ने का फैसला नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, अपने लोगों और अपने वार्ड को एक अधिक न्यायसंगत, पारदर्शी और सशक्त व्यवस्था में बदलने का साझा संकल्प है।

 

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