उदयपुर निकाय चुनाव : वार्ड 6 में पूर्व पार्षद दिनेश गुप्ता की साख ही बनेगी भाजपा की ढाल, मुकाबले में दलपत सोनी के लिए साबित होंगे तुरुप का इक्का

फोटो : कमल कुमावत

उदयपुर। उदयपुर नगर निगम का वार्ड क्रमांक छह इन दिनों स्थानीय लोकतंत्र की एक अनूठी और विचारणीय प्रयोगशाला बना हुआ है। किसी भी चुनाव में जब दलीय आग्रहों से परे जाकर देखा जाए, तो असली सवाल यह उठता है कि क्या उम्मीदवार ज़मीन की नब्ज़ पहचानता है? क्या वह महज़ नारों का सौदागर है या फिर आम आदमी की रोज़मर्रा की दुश्वारियों को दूर करने की नीयत रखता है?

वार्ड छह का यह इलाका ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है, किंतु राजनीति में कोई भी दुर्ग हमेशा के लिए अभेद्य नहीं होता। इस क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी ताक़त या यूं कहें कि उसकी राजनीतिक ‘धरोहर’ पूर्व पार्षद दिनेश गुप्ता हैं। वे इस क्षेत्र से पहली बार भाजपा का परचम लहराने वाले नेता रहे हैं। हालांकि इस वार्ड से पार्षद चुने जाने के बाद चंदरसिंह कोठारी मेयर भी रहे हैं। वे भी प्रचार की कमान खामे हुए हैं। हाथीपोल के बाशिंदे होने के नाते उनका संबंध किसी वर्ग, जाति या सम्प्रदाय के दायरे में बंधा नहीं है, बल्कि आत्मीय और व्यक्तिगत है। आज भी क्षेत्र की जनता उनमें अपना एक विश्वसनीय साथी देखती है। यही कारण है कि पार्टी के लिए ‘फिक्स डिपॉजिट’ की तरह मौजूद दिनेश गुप्ता अब मौजूदा भाजपा प्रत्याशी दलपत सोनी के लिए इस चुनावी समर की सबसे मज़बूत ढाल बनकर साथ-साथ पग-पग चल रहे हैं और मुकाबले को धार दे रहे हैं।

मुकाबले की दूसरी ओर कांग्रेस ने अजीत चौधरी को मैदान में उतारा है, किंतु उनके साथ सबसे बड़ी दिक्कत ‘बाहरी’ होने का तमगा है। मतदाता स्वभाव से संवेदनशील होता है; वह चाहता है कि उसका नुमाइंदा उसी की गली-कूचे का हो ताकि आधी रात को भी उसके दरवाज़े पर दस्तक दी जा सके। रही-सही कसर पूर्व कांग्रेसी पार्षद अरुण टांक की बेरुखी पूरी कर रही है, जो इस मर्तबा स्वयं वार्ड तीन से ताल ठोक रहे हैं। अपने ही पुराने क्षेत्र से उनकी यह दूरी कांग्रेस के पारम्परिक समीकरणों को भीतर से कमज़ोर कर रही है, जिसका सीधा लाभ विपक्ष के खाते में जाता दिखाई देता है।

अब बात करें भाजपा उम्मीदवार दलपत सोनी की। वे स्थानीय हैं, ज़मीनी हैं और समस्याओं से पूरी तरह वाकिफ हैं। चेतक सर्किल व्यापार संघ और सामाजिक संगठनों से जुड़े रहने के कारण उनका व्यवहार तो सहज और निष्कलंक है, मगर उनकी सीमा यह है कि वे बहुत मुखर या ज़ोरदार वक्ता नहीं हैं। लेकिन मेरा सदैव यह मानना रहा है कि लोकतंत्र में लच्छेदार भाषणों से अधिक अहमियत ठोस नीयत और शांत कर्मठता की होती है।

सवाल यह भी है कि इस पूरे चुनावी हल्ले में स्थानीय मुद्दे कहां हैं? हाथीपोल वह इलाका है जो देश-विदेश के पर्यटकों से गुलज़ार रहता है, मगर वहां न तो सुव्यवस्थित पार्किंग है और न ही सुचारु यातायात। पर्यटन का इतना बड़ा केंद्र होने के बावजूद वहां ढंग के सार्वजनिक शौचालयों का न होना हमारे योजनाकारों की घोर विफलता है। स्वरूप सागर की पाल पर बने डॉ. हेडगेवार पार्क की बदहाली और सरकारी ज़मीनों पर काबिज़ अतिक्रमण साफ बताते हैं कि विकास की फाइलें कहीं न कहीं स्वार्थों की भेंट चढ़ी हैं।

फैसला अब वार्ड छह के प्रबुद्ध नागरिकों को करना है। देखना यह होगा कि क्या वे भाषणों की चकाचौंध पर रीझते हैं या फिर दिनेश गुप्ता की उस साख और स्थानीय जुड़ाव को तरजीह देते हैं, जो दलपत सोनी के जरिए उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को सचमुच बेहतर बना सके।

 

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