पर्दे के पीछे: विरासत, संस्कार और सियासत की नई धूप

सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर

सिनेमा का एक पुराना नियम है—किरदार वही देर तक याद रहता है, जो संवादों से नहीं, अपनी मौजूदगी और पृष्ठभूमि से असर छोड़ता है। गुरुदत्त की फिल्मों में रोशनी और साये का जो खेल होता था, उसमें अक्सर खामोशी ही सबसे बड़ा सच बयां कर देती थी। सियासत भी कुछ-कुछ ऐसी ही है। यहां शोर बहुत है, पोस्टर बड़े हैं, नारे बुलंद हैं; मगर उस पूरे कोलाहल के भीतर कभी-कभी कोई चेहरा ऐसा दिख जाता है जो केवल सत्ता का गणित नहीं, बल्कि अपनी जमीन की नमी साथ लेकर चलता है।

झीलों के शहर उदयपुर के वार्ड संख्या 33 की गलियों में इन दिनों जो चुनावी बिसात बिछी है, वह सिर्फ एक पार्षद के चुनाव का सतही मामला नहीं है। यह परम्परा और नई पीढ़ी के बीच का एक बेहद दिलचस्प संवाद है। कांग्रेस के दीपक जैन यहां अपने तर्कों के साथ खड़े हैं, तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने युवा जतिन श्रीमाली पर भरोसा जताया है। राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह वार्ड भाजपा की मजबूत जमीन रहा है—ताराचंद जैन जो आज विधानसभा में शहर की आवाज हैं, और रवींद्र श्रीमाली जो कभी नगर परिषद की सदारत संभालते थे, इसी दहलीज से होकर गुजरे हैं।

मगर इस बार मुकाबला सिर्फ दलीय निष्ठा का नहीं, संस्कार और नजरिए की कसौटी पर है।

जतिन श्रीमाली को समझने के लिए थोड़ा पीछे मुड़कर उनके घर के आंगन को देखना जरूरी हो जाता है। उनके पिता स्वर्गीय प्रोफेसर विजय श्रीमाली अजमेर विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। वे उन विरले शिक्षाविदों में थे, जिनके लिए पद कभी इंसानियत से बड़ा नहीं हुआ; पर्यावरण के प्रति उनकी गहरी निष्ठा और दबे-कुचले लोगों की मदद करने की सहज आदत आज भी पुराने लोगों के जेहन में जिंदा है। पिता की उस सादगी भरी विरासत को आठ सालों से अपने कंधों पर थामे रखना किसी भी नौजवान के लिए आसान इम्तिहान नहीं होता।

जतिन ने सियासत को किसी एयर-कंडीशन कमरे से नहीं देखा। छात्र राजनीति के दौर में एबीवीपी के बैनर तले फीस वृद्धि, कॉलेज में दाखिले और पुनर्मूल्यांकन के सवालों पर वे धूप में खड़े रहे। बाद में जब होटल एसोसिएशन के सचिव की जिम्मेदारी संभाली, तो साथियों को ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ जैसे पर्यटन स्थलों के अध्ययन दौरों पर ले जाकर यह समझने की कोशिश की कि आधुनिक दुनिया में पर्यटन और रोजगार का पहिया कैसे घूमता है।

लेकिन किसी भी शख्स की असल शिनाख्त इस बात से होती है कि वह समाज के सबसे कमजोर तबके के सामने कैसे पेश आता है। जब कोई युवा बिना किसी तामझाम के सरकारी स्कूलों के बच्चों तक बस्ते, किताबें और यूनिफॉर्म पहुंचाता है, स्कूल में तपती दोपहर के लिए आरओ-कूलर लगवाता है या फिर अस्पताल के बाहर बेबस तीमारदारों के बीच भोजन के पैकेट बांटता दिखता है, तो वहां राजनीति पीछे छूट जाती है और बुनियादी इंसानियत आगे आ जाती है। यह किसी चुनावी घोषणापत्र की तैयारी नहीं, बल्कि एक ऐसा दायित्व है जो उन्होंने अपने घर की सीख से पाया है।

आज जब स्थानीय निकायों में ‘जेन-जी’ (Gen-Z) और नई सदी के नौजवानों के प्रतिनिधित्व की बहस छिड़ी है, तब वार्ड 33 में अपने ही घर की चौखट से लड़ता यह नौजवान एक उम्मीद की तरह नजर आता है। नई पीढ़ी से जीवंत संवाद और बुजुर्गों की विरासत के बीच संतुलन साधना ही किसी नए नेतृत्व की सबसे बड़ी खूबी होती है। राजकपूर की ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का वह सीधा-सा फलसफा याद आता है—लोगों के दिलों में वही उतरता है, जिसकी नीयत साफ हो और नजर धरातल पर टिकी हो। उदयपुर का यह चुनावी मोड़ भी शायद अपने भविष्य के लिए उसी सादगी और संजीदगी को तौल रहा है।

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