उदयपुर के वार्ड 22 का महामुकाबला : जब साझी तहज़ीब की ज़मीन पर बाहरी बनाम स्थानीय की लकीरें खिंचने लगें!

सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर।

हमारे देश की स्थानीय राजनीति का मिजाज भी गजब है। जब बड़े फलक पर चुनाव होते हैं तो दिल्ली और जयपुर के स्टूडियो में बैठे पंडित राष्ट्रीय आख्यान गढ़ते हैं, लेकिन ज़मीन पर—वार्ड और मोहल्लों की चौखट पर—सियासत का व्याकरण एकदम बदल जाता है। उदयपुर नगर निगम का वार्ड संख्या 22 इस वक्त ऐसी ही एक दिलचस्प, रोमांचक और भीतर ही भीतर सुलगती सियासी बिसात का अखाड़ा बन चुका है। मुकाबला कुछ ऐसा है, जैसे भारत और पाकिस्तान के बीच का कोई क्रिकेट मैच हो—जहां सांसें थमी हैं, निगाहें टिकी हैं और हर एक वोट की गिनती पर तख्तापलट का दारोमदार है।

वार्ड का गणित बहुत सीधा और उतना ही पेचीदा है। हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं का अनुपात लगभग बराबर-बराबर। जिसे चुनावी भाषा में ‘संवेदनशील’ कहा जाता है, वह इस वार्ड की बनावट है; लेकिन गनीमत यह है कि गलियों में दशकों पुरानी साझी तहज़ीब का सौहार्द अभी भी सांस ले रहा है।

असली तमाशा विचारधारा का नहीं, स्थानीय बनाम बाहरी के द्वंद्व का है।

मैदान में दो चेहरे हैं। एक तरफ हैं भारतीय जनता पार्टी के हरीश कुमावत, और दूसरी तरफ हैं कांग्रेस के हिदायतुल्ला। हिदायतुल्ला के पोस्टर दीवारों पर चस्पा हैं, चेहरे पर मुस्कान है और उनमें यह हुनर भी है कि वे हाथ मिलाते ही संबंध बना लेते हैं। लेकिन राजनीति में हुनर कभी-कभी भूगोल के आगे छोटा पड़ जाता है। हिदायतुल्ला मल्लातलाई के बाशिंदे हैं, वहां से निवर्तमान पार्षद रहे हैं। अब वार्ड 22 में उन्हें ‘बाहरी’ होने का ठप्पा झेलना पड़ रहा है।

मुस्लिम बस्तियों के भीतर भी यह फुसफुसाहट दबी जुबान से तैर रही है कि आखिर अपने ही इलाके की कद्दावर दावेदार नजमा मेवाफरोश का हक छीनकर मल्लातलाई से उम्मीदवार क्यों आयात किया गया? पार्टी के गलियारों में चर्चाएं आम हैं कि हिदायतुल्ला की इस ‘पैराशूट लैंडिंग’ के पीछे दिल्ली दरबार में बैठे राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा का वरदहस्त है। जब सियासत में ऊपर से फैसले थोपे जाते हैं, तो नीचे कार्यकर्ताओं के दिलों में जो दरारें पड़ती हैं, उन्हें पाटना आसान नहीं होता।

दूसरी तरफ खड़े हैं हरीश कुमावत—एम.कॉम तक शिक्षित, सौम्य, संघ की पाठशाला से निकले हुए और युवा मोर्चा से लेकर मंडल तक ज़मीनी खाक छाने वाले निष्ठावान कार्यकर्ता। एक बेटा जर्मनी में वैज्ञानिक बनने की राह पर, दूसरा भी विदेश में। यानी पारिवारिक रूप से बेफिक्र, मगर सियासी तौर पर बेहद सतर्क। कुमावत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे इसी मिट्टी के हैं। चालीस साल से उनका कुनबा इसी इलाके में जी-मर रहा है।

कुमावत जानते हैं कि मुकाबला कांटे का है। वे मुखर्जी चौक सब्जी मंडी के संवेदनशील मुद्दे पर भी रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक विजन रख रहे हैं। जब लोग मंडी हटाने पर सवाल उठाते हैं, तो वे आधुनिक तकनीक से लैस नई बहुमंजिला सब्जी मंडी का खाका पेश कर देते हैं, ताकि व्यापारी और ग्राहक दोनों सध जाएं। उनका दावा है कि उनका व्यक्तिगत संपर्क और स्थानीय होना ही इस चुनाव की सबसे बड़ी पूंजी है।

इतिहास गवाह है कि वार्ड का एक छोर कांग्रेस और निर्दलीयों की पनाहगाह रहा है, तो दूसरा छोर जनसंघ के जमाने से भाजपा का अजेय दुर्ग। इस बार दोनों छोर आमने-सामने हैं।

सवाल यह नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा। सवाल यह है कि क्या वार्ड 22 का जागरूक मतदाता किसी बड़े नेता की सिफारिश पर आए ‘मेहमान प्रत्याशी’ की सियासी शोहरत को तरजीह देगा, या फिर अपने ही सुख-दुख में हर रोज़ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने वाले ‘स्थानीय बेटे’ के सिर पर जीत का सेहरा बांधेगा? फैसला मतपेटियों में कैद होना है, मगर इतना तय है कि इस वार्ड का नतीजा केवल एक पार्षद का फैसला नहीं करेगा, बल्कि उदयपुर की अंदरूनी सियासत के कई स्थापित मिथकों को तोड़ेगा भी।

 

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