कांग्रेस का यह कैसा संस्कार : मर्यादा, अहंकार और उदयपुर की तल्खी

उदयपुर। हमारी राजनीति का स्तर दिन-ब-दिन कितना नीचे गिरता जा रहा है, इसका ताजा प्रमाण झीलों की नगरी उदयपुर से मिला है। राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है, विचार टकरा सकते हैं, लेकिन जब भाषा से मर्यादा, शिष्टाचार और परस्पर आदर का लोप हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में सड़ांध आ चुकी है।

उदयपुर में कांग्रेस के भीतर जो हुआ है, वह केवल दो नेताओं की नोकझोंक नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार की एक भद्दी नुमाइश है। तीन बार चुनाव हार चुके वरिष्ठ नेता विवेक कटारा और पार्टी की युवा राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. दिव्यानी कटारा के बीच हुई बातचीत का जो कथित ऑडियो सामने आया है, उसे सुनकर किसी भी सुसंस्कृत व्यक्ति का सिर शर्म से झुक जाएगा।

एक तरफ एक विदुषी और सक्रिय युवा नेत्री है, जो अपने से वरिष्ठ नेता को पूरे आदर के साथ ‘भैया’ और ‘आप’ कहकर संबोधित कर रही है। भारतीय संस्कारों की यही खूबी है कि हम वैचारिक असहमति के बीच भी रिश्तों की मर्यादा नहीं लांघते। लेकिन दूसरी तरफ से क्या सुनाई देता है? अहंकार से भरा हुआ ‘तू’, ‘तुम्हारी हैसियत क्या है?’, ‘तुम कौन होती हो?’ और पद से हटवा देने की खुलेआम धौंस! यह कैसी सामंती और अहंकारी मानसिकता है? क्या राजनीति में लंबे समय तक रहने का मतलब यह होता है कि आप अपनी ही पार्टी की एक होनहार महिला सहकर्मी से बातचीत की न्यूनतम तमीज भी भूल जाएं?

जो लोग जनता की अदालत में बार-बार नकारे जा चुके हों, यदि वे जमीन पर पसीना बहाने वाले युवा चेहरों को उनकी ‘हैसियत’ बताने लगें, तो यह हास्यास्पद भी है और दयनीय भी। लेकिन इस अंधकार में डॉ. दिव्यानी कटारा का उत्तर सचमुच दिल को छू लेने वाला है। जब उन्हें युवा कांग्रेस तक सीमित रहने और अपने काम से काम रखने का हुक्म सुनाया गया, तो उन्होंने जो कहा, वह किसी भी सच्चे निष्ठावान कार्यकर्ता की अंतरात्मा की आवाज है—“कांग्रेस कोई टुकड़ों में बंटी जागीर नहीं है। युवा कांग्रेस हो, महिला कांग्रेस हो या मुख्य संगठन—हम सब एक हैं। मेरे खून में कांग्रेस है और जब तक जीवित हूं, सेवा करती रहूंगी।”

यह वाक्य उस अहंकार पर मर्यादा का ऐसा तमाचा है, जिसकी गूंज दिल्ली के 24 अकबर रोड तक सुनाई देनी चाहिए। क्या कांग्रेस आलाकमान इस पर आंखें मूंदे रहेगा? यदि अपनी ही पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता और एक महिला नेत्री के आत्मसम्मान को इस तरह सरेआम कुचला जाएगा और शीर्ष नेतृत्व खामोश तमाशा देखता रहेगा, तो फिर वे देश की आधी आबादी को किस मुंह से सम्मान और सशक्तिकरण का भरोसा दिलाएंगे?

राजनीति में पद किसी की बपौती नहीं होते। लोकतंत्र में वही टिकता है, जो विनम्र रहता है और जिसके पास लोक-कल्याण का भाव होता है। उदयपुर का यह घटनाक्रम बताता है कि कांग्रेस की असली बीमारी बाहर के विरोधी नहीं, बल्कि भीतर बैठे वे लोग हैं जो अपने अहंकार में संगठन की जड़ों को ही खोखला करने पर आमादा हैं। अब देखना यह है कि पार्टी नेतृत्व इस बदजुबानी पर नकेल कसता है या फिर इसे भी स्थानीय कलह मानकर कालीन के नीचे सरका देता है।

 

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