
सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर।
उदयपुर की सियासत इन दिनों सिर्फ एक नगर निगम चुनाव भर नहीं लड़ रही, वह अपने मिजाज, अपनी राजनीतिक मर्यादा और एक मंझे हुए खिलाड़ी के सब्र का इम्तिहान ले रही है।
जिस दौर में राजनीति टिकट न मिलने पर चौराहे पर कपड़े फाड़ने, गाली-गलौज करने और बगावत का झंडा बुलंद करने का नाम बन चुकी हो, उस दौर में अगर कोई राजनेता पिछले तीन दशकों से बिना कटुता, बिना बगावत और बिना किसी शोर-शराबे के हर फैसले को सिर माथे लगाता रहा हो, तो उसका नाम प्रमोद सामर है।

इस बार उदयपुर नगर निगम का वार्ड-51 महज एक वार्ड का चुनाव नहीं रह गया है। यह शहर की सबसे गर्म सियासी धुरी बन चुका है। सामर के चुनाव दफ्तर के बाहर उमड़ा कार्यकर्ताओं का सैलाब देखकर भ्रम होता है कि मुकाबला किसी पार्षद का है या विधानसभा और लोकसभा के किसी बड़े रण का। वे पार्टी की तरफ से मेयर पद के सबसे स्वाभाविक और वजनदार चेहरों में गिने जा रहे हैं। सामने कांग्रेस के गजेंद्र सिंह शक्तावत हैं और कुछ निर्दलीय भी गणित बिगाड़ने की फिराक में हैं, मगर सामर की उपस्थिति ने इस चुनावी अखाड़े को एक अलग ही गरिमा बख्श दी है।
उदयपुर की राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि प्रमोद सामर उस पीढ़ी के नेता हैं जो पार्टी में दो दर्जन से अधिक पदों पर रहे, संगठन को सींचा और ‘सहकारिता’ के क्षेत्र में अपनी ऐसी गहरी पैठ बनाई कि लोग उन्हें इस विधा का बेताज बादशाह मानने लगे। 2004 का वह दौर भी शहर को याद है जब पार्षद जीतकर सभापति की स्वाभाविक दावेदारी के बावजूद रवींद्र श्रीमाली के नाम पर उन्होंने उफ तक नहीं की और एक समिति अध्यक्ष के पद पर चुपचाप काम में जुट गए। उन्हें न कभी विधानसभा भेजा गया, न संसद—यह फैसला पार्टी का रहा होगा, मगर सामर ने कभी सड़क पर शक्ति प्रदर्शन कर अपनी ही चौखट को शर्मिंदा नहीं किया। विरोधियों ने अनगिनत तीर चलाए, आक्षेप गढ़े, मगर सामर की जुबान से कभी मर्यादा की सीमा नहीं लांघी गई।

जब उनसे शहर को लेकर बात होती है, तो लगता है कि वे सिर्फ समस्याओं की फेहरिस्त गिनाने वाले पारंपरिक नेता नहीं हैं। उनके पास झीलों की नगरी के लिए एक सुस्पष्ट, संजीदा विजन है। वे नाइट मार्केट की बात करते हैं, पर्यटकों के लिए विश्वस्तरीय बुनियादी सुविधाओं की बात करते हैं, झीलों के संवर्धन और आसपास के अंचलों को नए पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित करने का खाका खींचते हैं। रोजगार और शिक्षा को जोड़ते हुए तकनीकी विश्वविद्यालयों और स्कूलों की स्थापना का लोंग टर्म प्रोजेक्ट उनके पास है।
उनका तर्क बेहद सीधा और आईना दिखाने वाला है: “उदयपुर पर्यटन और स्वच्छता में सिरमौर रहा है, मगर इस मुकाम पर टिके रहना और दूसरे पैमानों पर अव्वल आना ही असली चुनौती है।”
अपने वार्ड-51 को लेकर भी उनका नजरिया किसी सतही राजनीतिज्ञ जैसा नहीं है। वे जानते हैं कि यह इलाका शहर का बौद्धिक और स्वास्थ्य का केंद्र है—जहां विश्वविद्यालय हैं, कॉलेज हैं, बड़े अस्पताल हैं और जहां से ऐतिहासिक आयड़ नदी का प्रवाह गुजरता है। आयड़ को लेकर जो नकारात्मकता दशकों से व्यवस्था की विफलता के कारण उपजी है, सामर उसे सकारात्मक ऊर्जा और विकास में बदलने का इरादा रखते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि सरकारी तंत्र में जड़ता है, मगर दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो रास्ते निकल ही आते हैं।
राजनीति में जीत और हार वक्त का फेर हो सकती है, लेकिन जब राजनीति में शुचिता, धैर्य और गरिमा के पन्ने पलटे जाएंगे, तो प्रमोद सामर का यह सफर उन तमाम लोगों के लिए एक नजीर रहेगा जो पहले ही मोड़ पर भटक जाते हैं। अब फैसला उदयपुर के मतदाताओं को करना है कि वे इस धैर्यवान तपस्या को शहर की कमान सौंपते हैं या सियासत अपनी उसी पुरानी ढर्रे वाली चाल चलती रहेगी।
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