
सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर
झील के शांत जल पर जब ढलती शाम की सुनहरी किरणें तैरती हैं, तब अरावली की गोद में बसा यह सुंदर नगर केवल पत्थरों और पानी का मेल नहीं लगता; यह हमारे पुरखों के सपनों और कला की एक जीती-जागती कहानी जान पड़ता है। इसी पावन नगरी के बीच, वार्ड 24 की तंग गलियों और बड़े दिल वाले लोगों के सामने एक पुराना साथी फिर अपनी सेवा का भाव लेकर आया है। नाम है—पारस सिंघवी।
नगर निगम के पिछले छह चुनावों में से चार बार जीत हासिल कर जनता की सेवा करने वाले सिंघवी इस बार पांचवीं बार मैदान में उतरे हैं। पहले उपमहापौर रहकर उन्होंने शहर की मुश्किलों से जो संघर्ष किया, वह किसी से छिपा नहीं है। उनके सामने विरोधियों के कदम भी डगमगाए; जहां पहले सुंदर वसीटा का नाम आया, पर उनके कदम पीछे खींचने के बाद पार्टी ने दीपिका कुमावत को मैदान में उतारा। सिंघवी के चाहने वाले चाहते थे कि वे बिना किसी मुकाबले के चुन लिए जाएं, लेकिन समय को एक नई परीक्षा ही मंजूर थी।
वार्ड के बुजुर्गों ने पारस को इन्हीं गलियों में खेलते, बड़े होते और जनता के दुख-दर्द में खड़े होते देखा है। धानमंडी की भीड़भाड़ में जब उन्होंने अतिक्रमण हटाने और सफाई के कड़े फैसले लिए, तो अपनों की नाराजगी भी सही; लेकिन शहर को संवारने की अपनी जिद नहीं छोड़ी। चेंबर ऑफ कॉमर्स की लंबे समय से संभाली जा रही बागडोर उनके इसी भरोसे और काम की गवाही देती है। उनके साथी अब यही आस लगाए बैठे हैं कि इस निष्ठावान सेवक को एक बार पूरे शहर का मुखिया (महापौर) बनने का मौका मिले।
भले ही लोग उनकी जीत को तय मान रहे हों, लेकिन पारस इस भरोसे में हाथ पर हाथ धरकर बैठने वालों में से नहीं हैं। वे एक गहरी और सहज बात कहते हैं—
“जिस तरह ऑपरेशन छोटा हो या बड़ा, दर्द तो असहनीय ही होता है; ठीक वैसे ही चुनाव चाहे जैसा भी हो, चुनाव तो चुनाव है। इसमें मेहनत पूरी और ईमानदारी से ही करनी पड़ती है। असल चुनौती जीत की नहीं, हर बार जनता के उस पवित्र भरोसे को दोबारा जीतने की होती है।”
महापौर पद को लेकर भी उनके मन में कोई गुमान नहीं, केवल एक गहरी जिम्मेदारी का भाव है। वे शांत मन से कहते हैं—
“महापौर कौन बनेगा, यह फैसला तो पार्टी संगठन का है। लेकिन अगर मुझे मौका मिला, तो हमारे बुजुर्ग जो इतना सुंदर शहर सौंप कर गए हैं, मैं उसे संवारने में कोई कसर नहीं छोड़ूंगा। यह पिछोला, यह फतहसागर और सुखाड़िया सर्किल हमने नहीं बनाए; यह तो कुदरत और हमारे पुरखों का दिया अनमोल तोहफा हैं। हमारा फर्ज बस इतना है कि हम इसे साफ, सुंदर और सुरक्षित रखें।”
वे भली-भांति जानते हैं कि शहर को अभी कई सुधारों की दरकार है। उनका मानना है कि वाहनों की बढ़ती भीड़, पार्किंग की किल्लत, सार्वजनिक शौचालय और झीलों में गिरते गंदे पानी को रोकना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। वे कहते हैं कि पर्यटन ही इस शहर की जीवनरेखा है, इसलिए नए होटल जरूर बनें मगर नियमों के दायरे में रहकर। जब तक आम जन जागरूक होकर व्यवस्था का साथी नहीं बनेगा, तब तक कोई भी बदलाव मुकम्मल नहीं हो सकता।
जिस मिट्टी में बचपन बीता और जहां की गलियों ने जवानी दी, वहीं से वे पांचवीं बार चुनावी परीक्षा दे रहे हैं। जीत पर उनका भरोसा अटल है, पर मेहनत में कोई कमी नहीं। आने वाले कल में महापौर की कुर्सी का फैसला क्या होगा—यह तो समय की गोद में ही छिपा है। वे तो बस कर्म के रास्ते पर चलने वाले एक पथिक हैं, जिनका सपना सिर्फ एक बेहतर, सुंदर और समर्थ उदयपुर है।
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